Sairandhri

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Author: Vinod Joshi

Availability: 5 in stock

Pages: 94

Year: 2024

Binding: Paperback

ISBN: 9789361832840

Language: Hindi

Publisher: Sahitya Academy

Description

सैरन्ध्री

महाभारत के विराटपर्व में वर्णित पांडवों के वनवास की कथा प्रायः सर्वविदित है। कौरवों से द्यूत में पराजित होने के परिणामस्वरूप पांडवों और द्रौपदी को बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास भुगतना पड़ा। अज्ञातवास के दौरान, वे विराटनगरी मत्स्यदेश में पहचान छिपाकर रहे। द्रौपदी विराट राजा की रानी सुदेष्णा की दासी, सैरंध्री बनी। मूल महाभारत में वर्णित इस कथानक को तनिक छूकर, यहाँ अलग रूप से दर्शाया गया है। यहाँ एक स्त्री के रूप में द्रौपदी के विशिष्ट व्यक्तित्व का चित्रण है। लुप्त हुई निजता और अन्य पहचान को धारण कर के जीने का असह्य भार द्रौपदी को जिन पड़ावों पर ले जाता है इसका मौलिक आलेखन इस प्रबंधकाव्य में किया गया है। संक्षेप में कहा जाए तो, यहाँ वह द्रौपदी है जो हमसे अपरिचित है।

‘सैरंध्री’, मेरा 2018 में प्रकाशित सात सर्ग और उनचास खंडों में गुजराती में लिखा गया, चौपाई और दोहे में निबद्ध प्रबंधकाव्य है, जिसमें महाभारत के विराट पर्व की कथा का संदर्भ लेकर द्रौपदी के मनोसंचालन के माध्यम से सदा अज्ञात ही रहते मानव जीवन की अपरिहार्य भयावहता का मौलिक आलेखन किया गया है। महाभारतकार से बिल्कुल अलग कविदृष्टि से यहाँ सैरंध्री को केवल एक स्त्री के रूप में दर्शाया गया है, जो अपने प्राकृतिक आविर्भाव और विपरीतपूर्ण स्थितियों के द्वंद्व में फँसी हुई है। कर्ण के प्रति उनका आजीवन प्रच्छन्न अनुराग, पाँच पांडव-पति के स्वीकार का अनपेक्षित समझौता, पुरुष के प्रति उसका स्त्रीसहज प्राकृतिक आकर्षण, कीचक पर उसका स्वयं किया गया आक्रमण, विराट राजा से दंडित किए जाने पर उसकी ऊर्जावान प्रतिक्रिया और निरंतर प्रकट के पीछे छिपी अप्रकट पहचान की उसकी खोज इस कविता की धरोहर है। अग्निपुत्री के चिता पर चढ़ने की घटना से कविता समाप्त होती है, लेकिन पाठक के चित्त में यहीं से ही वास्तव में शुरू होती है। कई आलोचकों और सहृदयों ने इस सुनिबद्ध प्रबंधकाव्य के वर्णसौंदर्य की और नव्य काव्यात्मक प्रयुक्तियों से इसमें बने हुए चिरकालीन दर्शन की सराहना की है। मध्यकालीन काव्यरूप का इसमें पुनरुत्थान देखा है।

हर कोई अपनी निजता से विभक्त हो गया है। सबकी निजी पहचान छीन ली गई है, छिपा ली गई है, विस्मृत हो गई है या तो लुप्त हो गई है। सभी किसी न किसी पहनावे से ढके जी रहे हैं। किसी के भी आंतर-बाह्य दोनों व्यक्तित्व की संगति कभी नहीं होती और समाधान के बावजूद दोनों पीड़ाकारी ही लगते हैं। इस दयनीय विडंबिका से हर कोई ग्रस्त है। एक तरह से मनुष्य का पूरा जीवन ही अज्ञातवास है। यह अकाट्य यथार्थ भी इस काव्य की धरोहर है।

इस काव्य में महाभारत की कथा में विवक्षित विराट पर्व के एक घटक को तनिक स्पर्श करके छोड़ दिया है। संभव है किसी को व्यासोच्छिष्ट महाभारत से यहाँ कुछ अलग निरूपण देखकर उसका भार लगे। लेकिन हम सभी के अपने-अपने महाभारत, कुरुक्षेत्र और युद्ध होते हैं। यहाँ ऐसा जो कुछ है वह सैरंध्री का है।

मैं इसे प्रबंधकाव्य कहता हूँ। इसमें सात सर्ग और उनचास खंड हैं। पहले सर्ग के पहले खंड को छोड़ बाकी सभी खंडों में सोलह मात्रिक चौपाई और दोहे का प्रयोग किया गया है। प्रत्येक खंड में छत्तीस पंक्तियाँ हैं। प्रत्येक खंड में आठ चतुष्क चौपाई में और दो युग्म दोहे में हैं। इस प्रकार का चुस्त प्रबंधन पहले से ही लक्षित था।

इस काव्य की रचना सन 2017 में ऑस्ट्रेलिया में, गुजराती भाषा में की गई। पुस्तक रूप में प्रकट होने से पहले गुजराती की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘नवनीत-समर्पण’ में इसका धारावाहिक रूप से प्रकाशन हुआ था। पूज्य मोरारि बापू कविमुख से इसे सुनने के लिए स्वयं घर पधारे। ढाई घंटे तक अविराम चलता इसका कवितापाठ अब तक करीब पैंतीस जगहों पर मैंने स्वयं किया है और सभी श्रोताओं को बहुत पसंद आया है। सिडनी में और भारत के कुछ शहरों में इसका नृत्य-नाट्य रूपांतरण भी मंचित किया गया। गणमान्य आलोचकों ने इसे प्रतिष्ठित काव्य के रूप में देखा और इस पर एकाधिक आलेख लिखे जो मानक पत्रिकाओं में छपे। ऑल इंडिया रेडियो ने कविमुख से इसका आर्काइविल रिकॉर्डिंग किया। यह सब देख ऐसी भावना हुई कि यदि इसका हिंदी भाषा में अनुवाद किया जाए तो अधिक भावक इसके सम्मुख हो सकते हैं। काव्य छंदोबद्ध था और मैं चाहता था कि हिंदी में इसका अनुवाद समच्छंद रूप में हो। छंद से मेरा तीव्र अनुराग है। अतः मैंने स्वयं इसे हिंदी में ढालने का निश्चय किया। जरूरत पड़ी तब भोपालसिंह राठौड़, शिल्पीन धानकी, नामदेव ताराचंदानी, आलोक गुप्त और हिमांशुराय रावल मेरी सहायता करते रहे। मैं उनके प्रति आभारवश हूँ। पंकज त्रिवेदी ने अपने संपादन में प्रकाशित प्रशस्त हिंदी पत्रिका ‘विश्वगाथा’ का दीपावली विशेषांक (2021) इस रचना के रूप में प्रकाशित किया था। मैं उनका भी आभारी हूँ। इस प्रबंध-काव्य को साहित्य अकादेमी का पुरस्कार (2023) मिलने पर गुजराती काव्य पत्रिका ‘कविता’ के तंत्री रमेश पुरोहित ने ‘कविता’ का ‘सैरंध्री विशेषांक’ प्रकाशित कर मुझे आभारवश किया है।

यह काव्य मैंने स्त्री को अर्पण किया है, इसके पीछे मेरा कोई समान नारीवादी अभिगम नहीं है। यह स्पष्ट करना आवश्यक लगता है।

आशा है, ‘सैरंध्री’ के इस हिंदी अनुवाद को भी गुजराती ‘सैरंध्री’ को मिला वैसा पाठकप्रेम अवश्य मिलेगा।

— विनोद जोशी

 

अनुक्रम

  • निवेदन — 7
  • कुछ शब्द — 11
  • सर्ग-1 — 17
  • सर्ग-2 — 28
  • सर्ग-3 — 39
  • सर्ग-4 — 50
  • सर्ग-5 — 61
  • सर्ग-6 — 72
  • सर्ग-7 — 83

Additional information

ISBN

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Binding

Paperback

Language

Hindi

Pages

Publishing Year

2024

Pulisher

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