Vijaydev Narayan Sahi

Vijaydev Narayan Sahi

विजयदेव नारायण साही

विजयदेव नारायण साही का जन्म 7 अक्टूबर, 1924 को कबीर चौरा, वाराणसी, उत्तर प्रदेश में हुआ। 1948 में उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. किया और उसके बाद तीन वर्ष तक काशी विद्यापीठ में अध्यापन किया। तत्पश्चात वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग में पढ़ाने लगे, जहाँ वे आजीवन रहे। आरम्भ से ही उनकी हिन्दी पढ़ने-लिखने में तीव्र रुचि रही, पर औपचारिक रूप से उन्होंने विषय के रूप में कभी किसी कक्षा में हिन्दी नहीं पढ़ी, न कभी हिन्दी माध्यम से पढ़ा। उर्दू माध्यम से पढ़ाई हुई, व उर्दू, फ़ारसी, अंग्रेज़ी—ये विषय रहे, एवं फ्रेंच और जर्मन में उन्होंने डिप्लोमा किया।

छात्र-जीवन में उन्होंने चंद क़रीबी मित्रों के साथ मिलकर ‘परिमल’ संस्था की स्थापना की, जो आगे चलकर इलाहाबाद की साहित्यिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केन्द्र बनी। सन् 1942 में उन्होंने भारत छोड़ो अभियान में हिस्सा लिया। पहले वाराणसी में और फिर भदोही में मज़दूरों-बुनकरों के बीच काम भी किया।

उनके जीवनकाल में उनका एक ही कविता-संग्रह प्रकाशित हुआ—‘मछलीघर’ (1966)। उनकी मृत्योपरांत प्रकाशित पुस्तकें हैं—‘साखी’ (1983), ‘संवाद तुमसे’ (1990) व ‘आवाज़ हमारी जाएगी’ (1995) (कविता-संग्रह); ‘जायसी’ (1983), ‘साहित्य व साहित्यकार का दायित्व’ (1983), ‘छठवां दशक’ (1987), ‘साहित्य क्यों?’ (1988), ‘लोकतंत्र की कसौटियाँ’ (1990) व ‘वर्धमान एवं पतनशील’ (निबन्ध-संग्रह)।

काव्य-रचना, साहित्यिक आलोचना एवं समाजवादी वैचारिक भाषणों के अतिरिक्त ‘आलोचना’ व ‘नई कविता’ पत्रिकाओं का सम्पादन भी उन्होंने किया।

1973 में भारत सरकार के सांस्कृतिक प्रतिनिधि की हैसियत से स्ट्रूगा वर्ल्ड पोएट्री फ़ेस्टिवल में भाग लिया। उलान बटोर, लेनिनग्राड, प्राग, वार्शावा, हैम्बर्ग, हाइडेलबर्ग के विश्विद्यालयों में ‘कंटेम्पररी इंडियन कल्चर एंड लिटरेचर एंड दि इम्पैक्ट ऑफ़ द वेस्ट’ विषय पर भाषण दिए।

5 नवम्बर, 1982 को उनका निधन हुआ।

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