Aadhunikta Aur Uttar-Aadhunikta

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Aadhunikta Aur Uttar-Aadhunikta

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350.00 265.00

In stock

350.00 265.00

Author: Ganga Prasad Vimal

Availability: 5 in stock

Pages: 280

Year: 2012

Binding: Paperback

ISBN: 9789381272916

Language: Hindi

Publisher: Nayeekitab Prakashan

Description

आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता

उत्तर-आधुनिकता की सैद्धांतिकी में प्रथम तात्विक भाव है आधुनिकता का तिरस्कार अर्थात् जो कुछ आधुनिक समय में स्वीकार्य हो वह उत्तर-आधुनिक काल में संगत नहीं है। विमर्शकों ने कुछ बिन्दुओं की ओर संकेत किया जो आधुनिक काल में बेहद जरूरी थे और उस काल की बौद्धिक बहसों के केन्द्र में थे, मसलन धर्म, विज्ञान, मार्क्सवाद, समाजवाद, प्रजातन्त्र और फलश्रुति के रूप में जनस्वातन्त्र्य, व्यक्तिस्वातन्त्र्य वे बौद्धिक आधार न सिर्फ असंगत रह गये अपितु उनकी बुनियाद पर निर्मित वैचारिक प्रासाद अब मनुष्य की चिन्ता के केन्द्र में नहीं है। ये सब राज्यों के प्रशासनिक मामलों की तरह निस्तेज हो गए हैं। जैसा कि संज्ञा से ही स्पष्ट है, उत्तर-आधुनिकता आधुनिकता के उपरान्त का विचारावतरण है। वह आधुनिकता को संक्रमित कर आगे बढ़कर आधुनिकता की अवधारणा के मूल आधार अर्थात् परम्परा के अस्वीकार को भी अस्वीकृति में छोड़ आगे बढ़ जाता है। उत्तर-आधुनिकता आधुनिक युग की महान वैचारिक स्थापनाओं को भी संदेह की दृष्टि से देखती है, जैसा कि खुद आधुनिकता के साथ घटित हुआ क्योंकि आधुनिकता ने भी महाकाव्यों, महान आदर्शों जैसी धारणाओं को आधुनिक जीवन में असंगत करार किया। हिन्दी में तो आधुनिकता लघु मानव की अवधारणा के समानान्तर विकसित हुई और उसका चिन्तन फलक परम्परा के महान लक्ष्यों से अलग निर्मित हुआ। आधुनिकता का विरोध जो भीतर से हुआ है, वह भी विचारधारा द्वारा हुआ है और आधुनिकता के बाहरी विरोध का प्रमुख पक्ष धर्म तथा धर्म व नैतिकता से जुड़ी पुरानी मान्यताओं के समर्थक भी बाहरी विरोध में सक्रिय रहे हैं। तथापि आधुनिकता का चतुर्दिक विरोध की कमान उस जन समाज के पास रही है, जिसे आधुनिक योजनाओं ने ऊपरी आजादी और आर्थिक परवशता प्रदान की थी। इसलिए यह कहना अधिक संगत है कि आधुनिकता अपने विरोध के कारक अपने साथ ही ले आयी थी क्योंकि औद्योगिक विस्तार ने श्रमिकों, उपभोक्ताओं और मालिकों के वर्गों में अपने-अपने ढंग से आधुनिकता का प्रतिरोध आरम्भ किया था। कालान्तर में उत्तर-आधुनिक हमलों के कारण आधुनिकता चुपचाप आधुनिक पिछड़ेपन के ‘आर्कियालाजिकल’ अवशेषों में परिवर्तित होने के लिए अभिशप्त है, किन्तु उत्तर-आधुनिक समय कदाचित आधुनिक समय से ज्यादा राजनैतिक कसाव में है और वह बन्धन भी इतना प्रबल है कि उत्तर-आधुनिक संस्थान चाहे जितनी स्वायत्तता, स्वतन्त्रता, निर्विघ्नता का दावा करे, वह अदृश्य राजनैतिक जबड़ों के बीच ज्यादा कसी हुई है। शायद इसी कारण उसमें ज्यादा हिंसा, ज्यादा आक्रामकता का भाव विकसित हुआ है। यदि हम उसे केवल व्यापार के वैश्विक चरित्र के प्रकरण से ही देखें तो वह बाजार को पकड़ने, अपनी गिरफ्त में लेने की आक्रामकता, जल्दबाजी और तात्कालिकता से लैस है।

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Paperback

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Language

Hindi

Pages

Publishing Year

2012

Pulisher

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