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Description
आलोचक अज्ञेय की उपस्थिति
मैं समय-समय पर सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ पर लिखता रहा हूँ। मैंने पाया है कि अज्ञेय के आलोचक रूप को हिन्दी आलोचना ने दबा दिया है-केवल रचनाकर्म पर विचार होता रहा है। इसलिए आलोचना की लगी बँधी खूँटी से अपने को बचाकर इन लेखों में मैंने अपने को आत्मीय प्रतिक्रियाओं के प्रवाह में मुक्त बहने दिया है। अज्ञेय के आलोचना सूत्रों को पाने-थाहने की दृष्टि से यात्रा-साहित्य, कला-चिन्तन, साक्षात्कार, पत्र-साहित्य तथा वैचारिक आधार से जुड़े लेखों के चिन्तन को एकत्र करके दे दिया है। यह सब देने के पीछे मन यही रहा कि अज्ञेय के आलोचना-कर्म की मनोभूमिका को समझा जा सके। अब तक ये लेख पत्र-पत्रिकाओं में बिखरे पड़े थे उन्हें एक जगह एकत्रित भी करना चाहता था ताकि पाठकों का ध्यान एकाग्र रूप से उन पर जा सके।
मैंने पाया है कि पिछड़ी पीढ़ी अज्ञेय की अंगरेजियत से आक्रान्त रही है और उन्हें विदेशों का नकलची या अमौलिक साबित करती रही। नयी पीढ़ी अज्ञेय की भारतीयता, देसी ढंग की आधुनिकता या भारतीय आधुनिकता से ‘बोर’ हुई पड़ी है। और उनके नयेपन को पुराना ठहराने में जुटी हुई है। अज्ञेय आज आधुनिकों में प्राचीन हैं और प्राचीनों में आधुनिक। इस दृष्टि से उनकी सर्जनात्मक आलोचना का विशेष महत्त्व है।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Hardbound |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2011 |
| Pulisher |











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