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Description
अवधूत गीता
सरजो विरजो न कदाचिदपि
ननु निर्मलनिश्चलशुद्ध इति।
अहमेव शिवः परमार्थ इति
अभिवादनमत्र करोमि कथम्॥
ब्रह्म राजस (सक्रियता) और विरजस (निष्क्रियता) दोनों गुणों से मुक्त है। यह पूरी तरह से निर्मल (शुद्ध) और निश्चल (अचल) है। जब ‘मैं ही शिव (सत्य का प्रतीक) हूँ’, तो प्रणाम या अभिवादन का क्या अर्थ हो सकता है ?
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Sanskrit & Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2025 |
| Pulisher |











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