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एक औरत एक कयामत
: 1 :
वे किसी का दाह-संस्कार करके लौटे थे। मरने वाला कोई सम्पन्न व्यक्ति था, तभी तो उसकी अर्थी के साथ इतनी संख्या में लोग श्मशान घाट गए थे। कोई वृद्ध सेनापति, कोई बुजुर्ग आचार्य अथवा पुरोहित। जब बस्ती से बाहर निकले तो संध्या के क्षितिज की लाली उन पर सामने से पड़ रही थी। जब वे वापस लौटे तो आगे अँधेरा था और पीछे दूर जल रही चिताओं की रक्तिम लपटें। जैसे-जैसे वे नगर के प्रवेश द्वार की ओर बढ़ते आ रहे थे, यह लाली हल्की पड़ती जा रही थी।
श्मशान वैराग्य को पीछे छोड़कर आने वाले इन लोगों को दरवाजे की ओर आगे बढ़ते देख, कोई अँधेरी सूरत, रात के अँधेरे से भी बढ़कर अँधेरे दरवाजे के पास से बड़ी तीव्र गति के साथ छोटी दौड़ी और एक वृद्ध के दोनों ओर आकर उनसे लिपटने लगी। जब वे लोग दरवाजे से निकल गए और एक-दो व्यक्ति ही बाकी रह गए, तब यह अँधेरी सूरत पुनः अपने स्थान से लपक कर निकली और सामने आकर बड़े आर्त स्वर में बोली—
“मुझे कुछ खाने को दो। पाँच दिन से मैंने कुछ नहीं खाया। यदि आज भी मेरे पेट में रोटी का टुकड़ा न गया, तो गिरकर ढेर हो जाऊँगी। अब मुझ में सहन की अधिक शक्ति नहीं।”
उसके हाथ में एक बहुत बड़ा ख्याला था। पता नहीं उसमें क्या था, परंतु उसमें खाने की वस्तु कोई नहीं थी।
वे लोग इस डरावनी छाया से इस तरह घबराए, जाने वह कोई इंसान नहीं, कोई भूत-प्रेत हो।
“दूर हटो! दूर हटो! पीछे खड़े होकर बात करो।”
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2024 |
| Pulisher |











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