Description
एक मुँह दो हाथ
प्रथम परिच्छेद
दोपहर हो गयी थी। खेतों में निराही करते हुए गोपाल का अपना साया उसके पांव में आ गया। इस बात का ज्ञान होते ही उसने सिर उठाया और आकाश की ओर देखा। निर्मल नीलवर्ण निरभ्र आकाश बहुत सुन्दर दिखाई दिया। सूर्य सिर पर था। वह उठा और उसने ‘अपने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई।
बसन्त ऋतु थी। सरसों का खेत था और पीले फूलों से खेत भरा पड़ा था। दूर-दूर तक जो कुछ भी दिखाई देता था, पीला और हरा ही दिखाई देता था।
गोपाल ने आवाज़ दी, ‘‘मोहन ! अरे ओ मोहन !!’’ मोहन गोपाल के सबसे बड़े पुत्र का नाम था।
दूर खेतों से आवाज़ आई, ‘‘आया बाबा !’’
गोपाल ने कुएँ की ओर देखा। कुएँ पर सोहन रहट पर खड़ा बैलों को खोल रहा था। गोपाल ने सन्तोष अनुभव किया और अपना खुर्पा हाथ में पकड़े हुए कुएँ की ओर चल पड़ा। इस समय मोहन भी खुर्पा हाथ में लिए कुएँ की ओर चल पड़ा था। सोहन ने बैलों को कुएँ की नाल के नीचे बनी हौदी में जल पिलाया और फिर उनको कुएँ के पार्श्व में बनी कोठरी के बाहर धूप में ले जाकर खड़ा कर दिया। उनके सामने उसने खाने के लिए भूसा डाल दिया।
कुएँ के समीप पक्की सीमेंट का चबूतरा बना था। उस पर गोपाल और उसके बडे लड़के मोहन ने अपने खुर्पे रखे। मोहन ने रहट को हाथ से धकेला तो कुएँ से पानी निकलने लगा। गोपाल ने हाथ, पांव और मुख धोया । इस समय सोहन बैलों के सामने चारा इत्यादि डाल कुएँ के समीप आ गया। उसने रहट को धकेला तो मोहन ने भी हाथ मुख धो लिया। अब तीनों खड़े हो गाँव की ओर देखने लगे।
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