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गाँधी समय समाज और संस्कृति
भारत विश्व में सबसे बड़ा प्रजातन्त्र माना जाता है। सफलताएँ तो इन पचास वर्षों में हमने विज्ञान, टेक्नोलॉजी, आर्थिक और सामाजिक आदि अनेक क्षेत्रों में भी पायीं। उस सबका विस्तार से वर्णन करना आवश्यक नहीं है। आवश्यकता इस बात की पड़ताल करने की है, कि क्या हम इन सफलताओं के बाद भी एक सुगठित राष्ट्र के रूप में विश्व में एक ‘शक्ति’ बन सके ? क्या आज़ादी के दीवानों ने, उन दीवानों ने, जिन्होंने हँसते-हँसते अपने प्राणों का विसर्जन कर दिया, भले ही उनका मार्ग कुछ भी क्यों न रहा हो, पर लक्ष्य उन सबका ‘एक’ था क्या उन्होंने जो स्वप्न देखा था वह पूरा हुआ? बलिदान की भावना उन सबमें एक समान थी। वे सब अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जीना जानते थे और जीते भी थे। क्या हमने उनके इस गुण का सम्मान किया? क्या आज का भारत उनकी उन आशाओं और आकांक्षाओं का वह चित्र उपस्थित करता है, जो उनके मन में था? उनके ही मन में नहीं, बल्कि जन-जन के मन में था।
आज का जो परिदृश्य है, उसे देखक कोई कल्पना भी नहीं कर सकता, कि इस देश में कभी तिलक, गाँधी, सुभाष और आजाद जैसे अनेकानेक व्यक्ति भी हुए, जिन्होंने आज़ादी के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाकर अपने निष्काम कार्यों से विश्व को चकित कर दिया।
ऐसे में हमें भगवान बुद्ध के वे शब्द याद आते हैं, ‘आप दीपो भव’ अपना दीपक आप बनो। जब ऐसा होगा, तभी हम सच्चे समाज का निर्माण कर सकेंगे। समाज आख़िर व्यक्तियों का समूह ही तो है।
हम यहाँ कोई समाधान प्रस्तुत नहीं कर रहे हैं, बस व्यक्ति से आत्ममन्थन करने की कह रहे हैं।
मुक्ति का एक मार्ग ‘आत्ममन्थन’ है, ‘अपना दीपक आप बनना’ है और दूसरे के लिए जीने का वास्तविक अर्थ समझना है, पंचायत राज का वास्तविक अर्थ यही तो है और यही है गाँधी मार्ग।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Hardbound |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2025 |
| Pulisher |











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