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Description
समकालीन हिन्दी उपन्यास की परम्परा में ‘हलफ़नामा’ इसलिए भी विशेष महत्त्वपूर्ण है कि यह अंतर्वस्तु तथा शिल्पगत वैविध्य दोनों स्तरों पर पुरानी ज़मीन को तोड़कर सर्वथा एक नए धरातल पर खड़ा हुआ है। कथारस के नए सोपान के साथ, निपट सर्वहारा की जीवनगाथा कहता यह उपन्यास वस्तुतः मानव की उस अदम्य जिजीविषा को स्थापित करता है जो कि समाज में न केवल विभिन्न वर्गों और व्यक्तियों के बीच, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच भी रोज-ब-रोज का अंतःसंघर्ष है; अनिवार्य रूप से। यही अनिवार्यता ‘हलफ़नामा’ का बीजमंत्र है जो इस अकाट्य सत्य की ओर इंगित करता है कि व्यक्ति का व्यक्तित्व चाहे जितना विशिष्ट हो, इतिहास की धारा को मोड़ने व उसे नए दिशाबोध के साथ आगे बढ़ाने का महत् कार्य समाज की सामूहिक संकल्पबद्धता तथा वैचारिक परिपक्वता से ही संभव है।
डूब क्षेत्र से विस्थापन की समस्या इस उपन्यास की केंद्रीय विषयवस्तु है। विस्थापन की विसंगतियों, पीड़ाओं और दमन से त्रस्त वंचितों के बीच जब अपने वजूद को लेकर नया विमर्श होता है, तो जैसे उनमें भीतर से एक नया आदमी जन्म लेता है जो समूहबद्ध-संकल्पबद्ध होकर अपने समय, समाज और इतिहास को नया दिशाबोध, नवीन गति लय प्रदान करने की ओर अग्रसर हो जाता है। यही अभीष्ट भी है।
‘हलफ़नामा’ परस्पर त्याग और समर्पण के एकनिष्ठ भावबोध से भरे दाम्पत्य जीवन की एक उज्ज्वल प्रेमकथा भी है। यहाँ प्रेम अपने औदार्य को स्थापित करता हुआ बिखरते व्यक्तित्वों को नए जीवन-मूल्यों से परिचित कराता चलता है।
प्रेमचंद की जनोन्मुखी रचनाथर्मिता की अक्षुण्ण परम्परा को आगे बढ़ाता यह उपन्यास राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक स्तर पर आए विद्रूप के विरुद्ध एक नए समाज की सकर्मक संकल्पना का नया हलफ़नामा है जो निश्चय ही सहज पठनीय तो है ही, संग्रहणीय भी है।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Hardbound |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2019 |
| Pulisher |











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