Hannah Arendt : Hinsa Ka Sthapatya
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हन्ना आरेंट : हिंसा का स्थापत्य
मानव-जाति आधुनिक सभ्यता में अन्तर्व्याप्त हिंसा का सामना करने के लिए विवश है। हिंसा और आधुनिकता के इसी ताने-बाने को हन्ना आरेंट द्वारा समझा और अनावृत किया गया है। इसके प्रति आत्मचेतन होना सभ्यता की मौजूदा दहलीज़ पर हम सभी के लिए मानवोचित धर्म जैसा है।
हिंसा के आयाम समुद्री शैवाल की तरह इतने विस्तृत और सघन हो चुके हैं कि जब तक उनका एक सिरा पकड़ में आता है, दूसरा छूट जाता है। ऐसे में हम अनचाहे हिंसा को सहते जाते हैं, और अनजाने ही उसका समर्थन भी कर रहे होते हैं। आधुनिकता द्वारा निर्मित की गयी यह दुर्भाग्यपूर्ण मानव-परिस्थिति आशा के खो जाने जैसी है। इस आशा को पुनः अर्जित करने के लिए मनुष्य की उस नैतिक एवं आत्मिक सामूहिकता की शक्ति को कर्म की वास्तविक भूमिका में प्रतिष्ठित किया जाना आवश्यक है, जिसे हिंसा ने विस्थापित कर रखा है।
यह पुस्तक इसी अभिप्राय से किया गया गहन और आत्मचेतन बौद्धिक अध्यवसाय है। इसने उदात्त ब्राह्मिक मनीषा की आधारशिला पर अवस्थित रह कर हन्ना आरेंट के चिन्तन के बहुविध आयामों से अन्तरंग विमर्श करते हुए आधुनिक सभ्यता में हिंसा के स्थापत्य का उन्मोचनकारी प्रत्याख्यान किया है।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2026 |
| Pulisher |











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