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Description
कैद दर कैद
कहानीकार, उपन्यासकार और चिंतक मृदुला गर्ग का एक और महत्त्वपूर्ण रूप नाटककार का है। ‘कै़द–दर–क़ैद’ में उनके चार बहुचर्चित नाटकों को एक साथ पहली बार प्रस्तुत किया गया है।
नाट्य विशेषज्ञ गिरीश रस्तोगी जहां उनके नाटकों में मानवीय संवेदना और रंगभाषा की चुनौतियों को एक साथ देखते हैं, वहीं कृष्ण राघव की मान्यता है कि मृदुलाजी अपने नाटकों में मुद्दों की लेखिका है। वह कदम–कदम पर समाज को विचार के लिए उत्तेजित करती हैं। इस नाट्य संकलन में ‘कितनी कैदें’, ‘दुलहिन एक पहाड़ की’, ‘साम–दाम–दंड–भेद’ और ‘एक और अजनबी’ जैसे उनके बहुचर्चित नाटक एक साथ उपलब्ध हैं।
हिन्दी में प्राय: मूल नाटकों की कमी की बात नाट्य निर्देशकों की ओर से उठाई जाती है। ये नाटक न सिर्फ अपने मंचन में प्रशंसित हुए हैं, बल्कि इनमें नई पीढ़ी के निर्देशकों और दर्शकों के लिए भी भरपूर आकर्षण मौजूद है। नाटक को जो लोग महज मनोरंजन के लिए नहीं देखना चाहते, उन्हें मृदुलाजी के नाटकों की वैचारिक भूमि हमेशा आकर्षित करती रहेगी।
अलग–अलग कालखंडों में लिखे जाने के बावजूद अपनी तरह के एकदम अनूठे ये नाटक नाटककार की मूल विचारणा से परिचित कराने के साथ ही सामाजिक स्तर पर एक बड़े विमर्श की मांग करते हैं।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Hardbound |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2016 |
| Pulisher |











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