

Kavita Ki Pakshadharta

Kavita Ki Pakshadharta
₹995.00 ₹700.00
₹995.00 ₹700.00
Author: Prabhakaran Hebbar Illath
Pages: 280
Year: 2026
Binding: Hardbound
ISBN: 9789377376079
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Description
कविता की पक्षधरता
कोई भी रचना अपने रचयिता की व्यक्तिगत अनुभूतियों और आकलनों से ही आकार ग्रहण करती है। लेकिन कोई भी अनुभूति या आकलन इतना व्यक्तिगत नहीं होता कि शेष समाज से उसका कोई सम्बन्ध न हो। वास्तव में रचना के सन्दर्भ में, यह बात विशेष रूप से विचारणीय है कि जिसको रचनाकार की व्यक्तिगत अनुभूति माना जाता है उसका उत्स भी उसके समाज और परिवेश में ही होता है, भले ही वह बिलकुल स्पष्ट हो या सांकेतिक। किसी रचना की पक्षधरता को इसी दृष्टि से समझा जा सकता है। इस सन्दर्भ में, उन कारकों की पहचान करना आवश्यक है जो रचना के स्वरूप और कथ्य को निर्धारित करते हैं। यहाँ कवि अनुज लुगुन की इस बात का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा जो वह परम्परा और इतिहास के प्रति जीवन और दृष्टि की भिन्नता को लेकर कहते हैं—“जब दो भिन्न परम्पराएँ और इतिहास टकराते हैं तो हमेशा विजेता वर्ग की परम्परा और उसका इतिहास ही स्थापित होते हैं। विजयी होने की प्रक्रिया भाषा और संस्कृति के द्वारा स्थायी होती है। इसी प्रक्रिया में विजेता वर्ग मिथकों का निर्माण करता है। वह मिथकों के द्वारा विजितों का विरूपीकरण करता है और अन्ततः एक सांस्कृतिक उपनिवेश क़ायम हो जाता है।” अनुज की इस बात को आदिवासियों के सन्दर्भ में देखें तो यह सहज ही समझ में आता है कि ‘सभ्य’ समझे जाने वाला गैर-आदिवासी समाज जब आदिवासियों के बारे में लिखता है तो अपनी सभ्यतागत ‘श्रेष्ठता’ के कारण वह आदिवासियों के ‘असभ्य’ होने का मिथक गढ़ता है। जबकि आदिवासी रचनाकार को यह लिखते कोई संकोच महसूस नहीं होता कि ‘मैं भेड़िया कुल का हूँ’ क्योंकि वह स्वयं को अपने अरण्य-परिवेश से अभिन्न मानता है।
प्रस्तुत पुस्तक कविता के बहाने साहित्य में पक्षधरता के प्रासंगिक विषय को ऐसे अनेक हवालों से रोचक ढंग से विवेचित करती है।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Hardbound |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2026 |
| Pulisher |









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