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Description
लाल फीता
भूमिका
बाबू मलूकदास ने अपने जीवन में एक ही बात कही थी, जो बड़े मार्के की थी –
अजगर करै न चाकरी, पंछी करे न काम।
दास मलूका यों कहें, सबके दाता राम।।
साफ जाहिर है कि जो आदमी अजगर है यानी अजगरी प्रवृत्ति का है, उसके बस की नौकरी नहीं है। वह तो बस एक जगह पड़े-पड़े अपना पेट भरता रहता है। प्रवृत्ति तो हमारी भी अजगर किस्म की है, मगर नौकरी कर ली। इसमें कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए, क्योंकि प्रवृत्ति का अंकन परिवार के स्तर पर यदि देखें, तो आपको मालूम होगा कि हमारे तीन भाइयों ने नौकरी के ऑफर को यूँ कहकर बीसवीं सदी के अंतिम दशक में ठुकरा दिया कि उनसे ये (यानी नौकरी) निभेगी नहीं। क्यों नहीं निभेगी, इसी अजगरी प्रवृत्ति के कारण। तो पूरे परिवार के स्तर पर परिणाम ये हुआ कि यदि चार भाइयों की एक इकाई मान लें, तो हम एक चौथाई हिरन तीन चौथाई अजगर हुए। ताज्जुब तो यह कि अजगर हिरन के घर नौकरी कर ले। यही हुआ और हमने काफी दौड़ धूप वाले माल महकमे में अपनी आमद करा दी। इस नौकरी में रहकर लेखन तो और भी मुश्किल हुआ न। तब हम मलूकदास की भाँति इस परिस्थिति पर एक दोहे का आधा भाग रख देते हैं :
नीम चढ़ा करेला, अदरख के संग खाय।
मेरा आपसे अनुरोध है कि आप इस दोहे को पाजिटिव सेंस में पूरा कर भेजिए, मैं आपको अपना उस्ताद मान लूँगा। समस्या पूर्ति हिन्दी में वैसे भी काफी पुरानी विधा है। हम आज से इसको पुर्नजीवित कर रहे हैं।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Hardbound |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Publishing Year | 2023 |
| Pages | |
| Pulisher |











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