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Description
लेखक का मन
एक उपन्यासकार-कथाकार की वैचारिक प्रतिबद्धता, उसके सरोकारों, उसकी चिन्ताओं और मूल चिन्तन की जितनी गहन पड़ताल और परख उसके सृजनात्मक लेखन से होती है, उतनी ही उसके लेखों से होती है। उन लेखों से जो समय-समय पर सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और समकालीन विमर्शों को आधार बना कर, अपना एक ज़रूरी हस्तक्षेप दर्ज कराते हैं। लेखक का मन हमारे समय के महत्त्वपूर्ण और अपने गहरे कथात्मक अन्वेषण, अनुसन्धान और अछूते विषयों को केन्द्र में रख कर, तथा हिन्दी कथा-साहित्य में अपनी अलग और देशज छवि बनाये व बचाये रखने वाले कथाकार भगवानदास मोरवाल के समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में, प्रचलित विमर्शों के बरअक्स मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों और सर्वसत्ता व लोकविरोधी तत्त्वों के विपक्ष में खड़े प्रकाशित लेखों का संकलन है। ये लेख उनके सृजनात्मक लेखन की तरह लोक-मानस की अनुकृतियों को उकेरने वाले तथा आम आदमी की प्रबल अदम्यता और जिजीविषा की पड़ताल तथा परख करने वाले चिन्तन से लबरेज़ हैं।
लेखक का मन के अधिकतर लेख 2004-05 में सामाजिक समरसता का मानक, मधेपुरा (बिहार) से श्यामल किशोर यादव के सम्पादन में प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका मण्डल विचार में प्रकाशित हो चुके हैं। पत्रिका के हर अंक में महात्मा गाँधी का यह उद्बोधन तीसरे पृष्ठ पर प्रमुखता के साथ सबसे ऊपर प्रकाशित होता था – “मैं ऐसे भारत के लिए काम करूँगा, जिसमें सबसे निर्धन व्यक्ति भी इसे अपना देश समझे और इसके निर्माण में उसकी प्रभावी भूमिका हो, एक ऐसा भारत जिसमें लोगों का कोई उच्च वर्ग-निम्न वर्ग न हो, जिसमें सभी समुदाय पूरे सद्भाव के साथ रहते हों…. इस प्रकार के भारत में छुआछूत नामक कोढ़ के लिए कोई जगह नहीं होगी… स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार होंगे… मेरे सपनों का भारत यही है।” इसी पत्रिका में मेरे मन की गंगा शीर्षक से स्तम्भ के अन्तर्गत ये लेख लगभग एक वर्ष तक निरन्तर प्रकाशित होते रहे। इन लेखों में एक खाँटी भारतीय मानस के खुरदरेपन और तुर्शी के अलावा उपेक्षितों, वंचितों और हाशिए के समाजों के प्रति एक लेखक की चिन्ता, उसके सपनों के समाज की कल्पनाओं व अपेक्षाओं की झलक साफ देखी जा सकती है। एक लेखक के रूप में जो दायित्व उसकी सामाजिक संरचना व जीवन संघर्ष के चलते तय होते हैं, उनके सूत्र व बिन्दु इन लेखों में मिलते हैं
इस संकलन में वर्तमान साहित्य के जनवरी 2001 के अंक में प्रकाशित बेहद विवादास्पद और चर्चित लेख दलित विमर्श के अन्तर्विरोध भी शामिल है। इस लेख को पढ़ कर इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि दलित साहित्य में सामूहिक विमर्श आज जिस तरह जातिगत विमर्श में तब्दील हो चुका है, उसकी आहट भगवानदास मोरवाल ने डेढ़ दशक पहले ही सुन ली थी। आज जब भगवानदास मोरवाल हिन्दी कथा-जगत का एक जाना-पहचाना और ज़रूरी नाम बन चुका है, ऐसे में इस लेख को आसानी से नज़रअन्दाज़ नहीं किया जा सकता। इन लेखों की एक विशेषता यह भी है कि जटिल और दुर्बोध चिन्तन की अपेक्षा, इनकी पठनीयता पाठक के कोमल मन को बड़ी सहजता व कोमलता के साथ सहलाती चलती है। इस संकलन के लेखों की परिधि और अर्थध्वनियाँ इतनी व्यापक व महीन भले ही न लगे, लेकिन इतना ज़रूर है कि इनकी मारक क्षमता बेहद तीक्ष्ण है। बावजूद इसके भगवानदास मोरवाल के उपन्यासों और कहानियों की तरह ये लेख भी वैचारिकी एवं सैद्धांतिकी की बँधी-बँधाई परिपाटी का अतिक्रमण करने का आभास देते हैं, यह जानते हुए कि ये दोनों परिपाटियाँ परिवर्तनशील भी हैं।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Hardbound |
| ISBN | |
| Pages | |
| Language | Hindi |
| Publishing Year | 2017 |
| Pulisher |











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