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Description
लोक नाट्य : विविध संदर्भ
लोक कलाएँ किसी न किसी समाज के सांस्कृतिक सौंदर्य और जीवन दर्शन को प्रस्तुत करती हैं। जिस समाज की विभिन्न कलाएँ जितनी अधिक समुन्नत अवस्था में होती हैं, वह समाज उतना ही लोक और प्रकृति के निकट होता है। वह समाज अपनी परंपराओं और जीवन मूल्यों का संवाहक होता है। लोक नृत्य, नाट्य और गायन की परंपरा के उद्भव की बात करें तो इनका कोई निश्चित समय काल नहीं है। वास्तव में जबसे मनुष्य ने प्रकृति के स्पंदन और अपने स्पंदन को एकमेव करके कुछ महसूस किया और फिर उसको अभिव्यक्त करने की इच्छा जगी, तभी से इन कलाओं का उद्भव हुआ। मनुष्य ने जब पहली बार लोकभावना और सामुदायिक चेतना से अभिप्रेरित होकर अपने भावाभिव्यक्त किए, उसी को हम कलाओं का उद्गम स्थल मान सकते हैं। लोक कलाएँ श्रम और उत्पादन के कार्यों से अनुप्रेरित रही हैं। प्रकृति और जीवन यापन के संघर्षों के कारण मनुष्य की चेतना और विचार शक्ति विकसित हुई। समयांतराल में जिस प्रकार मनुष्य की सामुदायिक चेतना विकसित होती गई, उसी प्रकार उत्पादन के स्वरूप और उसकी कलाएँ विकसित होती गईं।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Hardbound |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2025 |
| Pulisher |











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