Manas Manthan-3 (Shiv Tattva)
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मानस मंथन-3 (शिव तत्त्व)
।।श्री रामः शरणं मम।।
मानस में शिव तत्त्व
विविधता में एकता
एक ही तत्त्व को विविध देवताओं के रूप में स्वीकार करना हिन्दू उपासना पद्धति की एक विशिष्टता है। वाह्य दृष्टि से यह बड़ी ही अटपटी पद्धति है जिसे समझना विदेशी विद्वानों के लिए कठिन हो जाता है। भारत में भी इस पद्धति का जो परिणाम बहुधा देखने को मिला वह भी दुर्भाग्यवश उनकी धारणाओं का समर्थन करने वाला है। प्रत्येक वर्ग के एक विशिष्ट भगवान् और अन्य वर्गों के भगवान् से तुलना करते हुए अपने भगवान् की श्रेष्ठता का दावा, संघर्ष तथा एक दूसरे की निन्दा जैसे फलितार्थों को देख कर बहुतों की उसमें अरुचि हो जाना स्वाभाविक है।
तो फिर क्या हिन्दू उपासना पद्धति एक भ्रामक, रूढ़िग्रस्त और अविवेक युक्त वस्तु है ? विचारपूर्वक भारतीय वाङ्मय का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि इस उपासना पद्धति के पीछे गम्भीर दर्शन है। स्वयं में उसका उद्देश्य महान् है। भले ही विविध कारणों से अधिकांश लोगों ने उसके तात्त्विक रूप को न समझा हो और उपासना के माध्यम से ही उन्होंने अपने अहं को तुष्टि की हो और उसे संघर्ष का कारण बना लिया हो।
फिर भी समय-समय पर ऐसे महापुरुष हुए जिन्होंने अनेकता में छिपी हुई एकता और अनेकता का तात्त्विक उद्देश्य समाज के समक्ष रख कर उसका उद्बोधन करना चाहा।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2015 |
| Pulisher |











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