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मानस मुक्तावली – 1
‘मानस-मुक्तावली‘ का प्रथम खण्ड जिन सौ चौपाइयों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है, वे निम्नलिखित हैं :
- वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।
मंगलानां च कर्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥
- भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धा-विश्वासरूपिणी।।
याभ्यां बिना न पश्यनित सिद्धाः स्वान्तः स्थमीश्वरम्॥
- राम भगति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म विचार प्रचारा॥
- बिधि-निषेधमय कलिमल-हरनी। करम कथा रबिनंदिनि बरनी॥
- मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहि जतन जहाँ जेहि पाई॥
- सो जानब सतसंग प्रभाऊ। लोकहुँ बेद न आन उपाऊ॥
- जड़ चेतन गुन दोषमय, बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पय, परिहरि बारि बिकार।
- खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू॥
- स्याम सुरभि पय बिसद अति, गुनद करहिं सब पान।
गिरा ग्राम्य सियराम जस, गावहिं सुनहिं सुजान।
- कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥
- प्रनवउँ प्रथम भारत के चरना। जासु नेम व्रत जाइ न बरना॥
- रामचरन पंकज मन जासू। जासु नेम ब्रत जाइ न बरना।
- बन्दउँ लछिमन पद जल जाता। सीतल सुभग भगत सुखदाता॥
- रघुपति कीरति बिमल पताका। दण्ड समान भयउ जसा जाका॥
- सेस सहस्र सीस जग कारन। जो अवतरेउ भूमि भय टारन॥
- सदा सो सानुकूल रहु मो पर। कृपासिन्धु सौमित्रि गुनाकर॥
- रिपुसूदन पद कमल नमामी। सुर सुसील भरत अनुगामी।
- महाबीर बिनवउँ हनुमाना। राम जासु जस आपु बखाना।
- जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की।
- ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपा निरमल मति पावउँ॥
- गिरा अरथ जल बीचि सम, कहिअत भिन्न न भिन्न।
बंदउँ सीता राम पद, जिन्हहिं परम प्रिय खिन्न।
- बंदउँ नाम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को।
- अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी। उभय प्रबोधक चतुर दुभाखी॥
- रामकथा मन्दाकिनी, चित्रकूट चित चारु।
तुलसी सुभग स्नेह बन, सिय रघुबर बिहारु॥
- संबत सोरह से एकतीसा। करउँ कथा हरिपद धरि सीसा॥
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| ISBN | |
| Binding | Paperback |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2018 |
| Pulisher |











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