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Description
मानस रोग – 1
प्रथम प्रवचन
सुनहु तात अब मानस रोगा।
जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा।।
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला।
तिन्ह ते पुनि उपजहि बहु सूला।।
काम बात कफ लोभ अपारा।
क्रोध पित्त नित छाती जारा।।
प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई।
उपजइ सन्यपात दुखदाई।।
विषय मनोरथ दुर्गम नाना।
ते सब सूल नाम को जाना।।
ममता दादु कंडु इरषाई।
हरष बिषाद गरह बहुताई।।
पर सुख देखि जरनि सोई छई।
कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई।।
अहंकार अति दुखद डमरुआ।
दंभ कपट मद मान नेहरुआ।।
तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी।
त्रिबिध ईषना तरुन तिजारी।।
जुग बिधि ज्वर मत्सर अविबेका।
कहँ लगि कहौं कुरोग अनेका।। 7/120/28-37
नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान।
भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं रोग जाहिं हरिजान।।
भगवान श्री राघवेन्द्र की असीम अनुकम्पा और श्रद्धेय स्वामीजी महाराज के स्नेह से कई वर्षो से श्री विवेकानन्द जयन्ती के पावन प्रसंग में मुझे यहाँ आकर वाङमयी सेवा का कुछ अवसर प्राप्त होता है। वैसे तो भगवच्चरित्र का गायन जहाँ भी किया जाए, उनमें समग्रता और पूर्णता है, लेकिन इस आश्रम के पवित्र प्रांगण में एक महान सन्त की जयन्ती के सन्दर्भ में, एक सन्त के सन्निध्य में तथा आप भक्त और अध्यात्मपिपासु श्रोताओं के सक्षम कुछ कहने का आनन्द कुछ विशेष होता है। इसलिए इस आयोजन में सम्मिलित होकर मैं स्वयं धन्यता का अनुभव करता हूँ।
आदरणीय स्वामीजी महाराज ने प्रसंग के सम्बन्ध में आपको सूचित किया ही है। यह प्रसंग ‘श्रीरामचरितमानस’ के अन्यन्त गंभीर प्रसगों में से एक है तथा विगत कई वर्षों से ‘मानस’ के जिन प्रश्नों की चर्चा चलती रही है, उनमें यह सातवाँ और अन्तिम प्रश्न है। श्रीरामकथा श्रवण करने के बाद गरुड़ धन्यता का अनुभव करते हैं। कथा के आचार्य श्री काकभुशुण्डिजी उनसे पूछते हुए कहते हैं कि गरुड़जी ! मैंने अपनी क्षमता के अनुसार आपको राम कथा सुनायी है, अब बताइये ! आप और क्या सुनना चाहेंगे ? इस पर गरुड़जी ने सात प्रश्न उनके सामने रखे और उनका उत्तर दिया है वह प्रसंग ‘मानस’ में ‘सप्त प्रश्न’ के नाम से जाना जाता है। विगत कुछ वर्षों में हम यथासाध्य गम्भीर है। साथ ही यदि हम रामकथा को अपने जीवन से जोड़ना चाहें तो यह सातवाँ प्रश्न उपादेय भी बहुत है। मुझे विश्वास है कि आप इस प्रसंग को मनोभूमि में स्थिति होकर ही सुनेंगे, क्योंकि इस प्रश्न में ‘मानस’ शब्द की सार्थकता छिपी हुई है।
भगवान श्रीराम के सम्बन्ध में संस्कृत साहित्य में कई ग्रन्थ लिखे गये हैं, पर गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित इस रामकथा की उन सब ग्रन्थों की तुलना में अपनी एक विशिष्टता है। वैसे तो प्रचलित रूप से इसे भी रामायण कहकर ही पुकारा जाता है, पर भगवान शंकर के द्वारा इसका जो नामकरण किया गया उसका स्मरण करते हुए गोस्वामीजी इसका नाम श्रीरामचरितमानस रखते हैं। ‘रामचरित’ शब्द का अर्थ है जिसमें भगवान राम का चरित हो, पर यहाँ पर ‘रामचरित’ के साथ जुडा हुआ जो ‘मानस’ शब्द है तथा ‘मानस’ का उपसंहार करते हुए ‘सप्त प्रश्न’ में मानस-रोग को जो अन्तिम स्थान दिया गया है उसके निहित तात्पर्य को यदि हम समझ लें, तो इस गम्भीर प्रसंग को समझने में कुछ सरलता हो जायेगी। रामचरित के सन्दर्भ में अन्य जो प्रश्न हैं उनकी तुलना हम एक उच्चकोटि के कलाकार द्वारा निर्मित चित्र से कर सकते हैं। जब एक चित्रकार अपनी तूलिका से कोई चित्र अंकित करता है, तो जिस व्यक्ति का वह चित्र है, उसका साक्षात्कार तो हमें होता ही है, साथ ही उस चित्रकार के प्रति भी हमारे अन्तःकरण में आदर की भी भावना जाग्रत होती है।
यह सोचकर कि इसने कैसा कलात्मक चित्र प्रस्तुत किया है। तो, श्रीराम के सन्दर्भ में जो ग्रन्थ मुख्यता ऐतिहासिक दृष्टिकोण से लिखे गये हैं, वे मानो महान शब्द-शिल्पियों के द्वारा निर्मित चित्र है, उनका दर्शन करके भी हमारे अन्तःकरण में धन्यता का अनुभव होता है; लेकिन ‘श्रीरामचरित’ के साथ जुड़ा हुआ है जो ‘मानस’ शब्द है, वह भगवान राम के चरित्र के साथ एक विशेष तत्त्व और जोड़ देता है, मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं कि इस ग्रन्थ में भगवान राम का चित्र नहीं है। इसमें भगवान राम का भी चित्र है और उनके भक्तों को भी, फिर उनके विरोधियों का भी। चित्र ऐसा सांगोपांग है कि यदि आपके पास दृष्टि है तो आपको सूक्ष्म रेखा भी दिखायी दे सकती है, ‘रामचरितमानस’ के अन्तराल को समझने के लिए उसकी विशेषता का आन्नद लेने के लिए हम उसकी तुलना चित्र से न कर एक दर्पण से, शीशे से करना चाहेंगे।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2018 |
| Pulisher |











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