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Description
मेरे मुहल्ले के फूल
बिना चाशनी के परोस दी गयी हो। यह नहीं कि नरेन्द्र कोहली मीठा बोलते नहीं, पर वे मानते हैं कि जहाँ कहीं भी अतिरिक्त मिठास है, वहाँ झूठ उत्तना ही अधिक है। बहुत अधिक मीठा बोलनेवाले समाज के तथाकथित ‘अत्यन्त शिष्ट’ लोगों को झूठा और मक्कार मानने में उन्हें कोई संकोच भी नहीं होता। अपनी इसी मान्यता के कारण उनकी प्रवृत्ति सीधी और खरी बात कह देने में अधिक है।प्रतीकात्मकता, विधायकता, तटस्थता, समग्र प्रभाव और संयम नरेन्द्र कोहली के व्यंग्य के प्रभावक तत्त्व हैं।अपने व्यंग्य में उन्होंने हिन्दी व्यंग्य-साहित्य की एकरसता को तोड़कर उसे एक नयी दिशा भी दी है। कहना असंगत नहीं होगा कि उनकी व्यंग्य रचनाएँ समकालीन जीवन में व्याप्त विसंगतियों पर जहाँ करारी चोट करती हैं, वहीं टूटते जीवन मूल्यों को रेशे-रेशे अलग करते हुए जीवन्त मानवीय मूल्यों को प्रतिष्ठित करने की कोशिश भी करती हैं। प्रख्यात व्यंग्य रचनाकार नरेन्द्र कोहली की, स्वयं उनके द्वारा चुनी गयी, एक सौ प्रतिनिधि व्यंग्य रचनाओं का यह संचयन मेरे मुहल्ले के फूल उनकी इन्हीं प्रवृत्तियों और उपलब्धियों का साक्षी है। उनकी व्यंग्य रचनाओं के बारे में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का यह कहना सही है कि इतना सहज भाव और ऐसी भेदक दृष्टि क्वचित् कदाचित् ही देखने को मिलती है।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Hardbound |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2026 |
| Pulisher |











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