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Pracheen Bharat
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Author: Radha Kumud Mukherjee
Pages: 184
Year: 2020
Binding: Hardbound
ISBN: 9788171780822
Language: Hindi
Publisher: Radhakrishna Prakashan
प्राचीन भारत
स्वर्गीय प्रो. राधाकुमुद मुखर्जी ने भारतीय इतिहास के अनेक पक्षों पर अपनी लेखनी चलाई है, लेकिन खासतौर से प्राचीन संस्कृति, प्राचीन कला और धर्म तथा राजनीतिक विचार उनके अध्ययन और लेखन के महत्त्वपूर्ण क्षेत्र रहे हैं।
प्रस्तुत पुस्तक में प्रो. मुखर्जी ने प्राचीन भारतीय इतिहास का परिचय सरल-सुबोध शैली में दिया है। प्रारम्भ में भारतीय इतिहास पर भूगोल के प्रभाव का विवेचन करते हुए उन्होंने इसकी मूलभूत एकता के तत्त्वों का आकलन किया है। इसमें उन तत्त्वों को उन्होंने विशेष रूप से रेखांकित किया है जो देश की एकता को सदियों से पुष्ट करते रहे हैं और जिनके कारण ही बृहत्तर भारत का निर्माण सम्भव हो सका। यहाँ यह द्रष्टव्य है कि अपने सारे विवेचन में उन्होंने राष्ट्रीयता और जनतंत्र की नैतिक आधारशिला के रूप में अखिल भारतीय दृष्टिकोण को ही प्रमुखता दी है और उनका विवेचन सर्वत्र एक धर्मनिरपेक्ष वैज्ञानिक दृष्टि से परिपुष्ट है।
प्रो. मुखर्जी ने यहाँ प्रागैतिहासिक काल से लेकर हर्षवर्धन के बाद तक के इतिहास को अपने विवेचन का विषय बनाया है और इस लम्बी अवधि के इतिहास की राजनीतिक-आर्थिक परिस्थितियों का अध्ययन करने के साथ-ही-साथ उस काल की सामाजिक-सांस्कृतिक उपलब्धियों को भी संक्षिप्त और सुगठित तरीके से इस पुस्तक में समेटा है।
प्रो. मुखर्जी की यह पुस्तक एक ओर अपनी प्रामाणिकता के कारण विद्वानों के लिए उपयोगी है तो दूसरी ओर भाषा-शैली की सरलता तथा रोचकता के कारण विश्वविद्यालयी छात्रों तथा इतिहास में रुचि रखनेवाले सामान्य लोगों के लिए भी उपयोगी है।
| Binding | Hardbound |
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| Authors | |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2020 |
| Pulisher |
राधाकुमुद मुखर्जी
प्रो. मुखर्जी का जन्म बंगाल के एक शिक्षित परिवार में हुआ। प्रेजीडेंसी कॉलेज, कलकत्ता से इतिहास तथा अंग्रेजी में एम.ए. की डिग्री लेने के बाद उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से पी-एच.डी. की डिग्री प्राप्त की।
अपने शैक्षिक जीवन की शुरुआत उन्होंने अंग्रेजी के प्रोफेसर के रूप में की, लेकिन कुछ समय बाद ही वे इतिहास में चले गए और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में प्राचीन भारतीय इतिहास तथा संस्कृति के महाराजा सर मनीन्द्रचंद्र नंदी प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हुए। इस पर वे केवल एक वर्ष रहे और उसके तुरंत बाद मैसूर विश्वविद्यालय में इतिहास के पहले प्रोफेसर नियुक्त हुए।

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