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Description
शब्दिता
भाषा, साहित्य, संस्कृति और इतिहास के किसी भी जागरुक रचनाकार की संवेदात्मक रचनाशीलता के अभिन्न अंग होते हैं। डॉ. धर्मवीर भारती हिन्दी के यशस्वी कवि, कथाकार और सुधी सम्पादक के रूप में सुपरिचित हैं। ‘कनुप्रिया’, ‘अंधायुग’, और ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ जैसी रचनाएँ समकालीन हिंदी साहित्य में अपना ऐतिहासिक महत्त्व रखती हैं।
‘शब्दिता’ भारत जी के निबन्धों का संग्रह है। इनमें कुछ तो ‘धर्मयुग’ के ‘शब्दिता’ शीर्षक बहुचर्चित स्तम्भ से संग्रहित हैं, और कुछ अन्य पत्र-पत्रिकाओं से लिये गये हैं। स्वभावता इन निबन्धों में से प्रायः प्रत्येक का एक समय संदर्भ है, लेकिन लेखकीय दृष्टि उससे सम्बद्ध समस्या अथवा विचारणीय मुद्दे को उसकी समग्रता में देखती है। उसकी पृष्ठभूमि में भारतीय संस्कृति की जो प्रवहमान परम्परा है, लेखक उसे कहीं भी आंख-ओझल नहीं करता। भारतीय समाज की विभिन्न समस्याओं, उसकी संरचनात्मक जटिलताओं और विश्वजनीन वैचारिक वादों-प्रतिवादों पर भी लेखक ने अपनी बेबाक राय प्रकट की है, फिर चाहे हिंदी उर्दू का मसला हो, अंग्रेजी के वर्चस्व का सवाल हो, या फिर साम्यवादी व्यवस्था के अपने ही अंतर्विरोधों के चलते ध्वस्त हो जाने का अभूतपूर्व घटनाक्रम।
इस सबके अतिरिक्त रचनात्मक वैविध्य और जीवन के प्रति गहन संवेदात्मक राग के लिए भी उल्लेखनीय हैं। अनेक निबंधों में भारती जी अपने समकालीनों और प्रियजनों को तो याद करते ही हैं, मॉरिशस और इंडोनेशिया जैसे एशियाई देशों में गंगा-यमुना के सामाजिक-सांस्कृतिक महत्त्व का भी ह्रदयग्राही शब्दचित्र उकेरते हैं। कहना न होना कि यह निबंधकृति पाठकों को विभिन्न विचार-वीथियों के सहारे एक सांस्कृतिक यात्रा कराने में सक्षम हैं।
इस अश्रबिन्दु की तरलाई को वही महसूस कर सकता है, जिसमें, इस समवेत पीड़ा की संवेदना की गहराई में उतर कर महसूस करने की क्षमता हो। पर जो क्षेत्रगत, सम्प्रदायगत, भाषागत या दलगत राजनीति की आँच में हाथ सेंक कर अपने लिए सुविधाएँ और नामवरी हासिल करने की जुगाड़ में ही लगे रहते हैं, ऐसे लोग उनका दर्द कैसे समझ पाएँगे, जिन्हें सचमुच आग पर पाँव रख कर चलना होता है ? और सांस्कृतिक समन्वयों की नींव तो उसी दर्द पर रखी जाती रही है।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Hardbound |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2025 |
| Pulisher |











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