- Description
- Additional information
- Reviews (0)
Description
तपस्या
उपन्यास का बहाना : हकीकत या फसाना
राजस्थान की पहचान मरुभूमि के रूप में रही है लेकिन तभी याद आती है वहाँ प्रेमिल ढोला-मारू की अमर प्रेम गाथा और कृष्ण प्रेम में आकण्ठ डूबी मीरा। इन अनोखी प्रेम गाथाओं को हम सुनते हैं, आनंद की अनुभूति भी होती है मगर इन आख्यानों में, इन प्रेम कथा / गीतों में हमें अपनी झलक नजर नहीं आती है।
श्री विश्वनाथ जी तँवर जब अपने जीवन का पहला उपन्यास ‘तपस्या’ लिखते हैं तब हिन्दी भाषा पर उनकी गहरी पकड़, शुद्ध हिन्दी शब्दों का बोधगम्य, प्रवाहयुक्त प्रयोग सहसा चमत्कृत करता है। पाठक उपन्यास पढ़ते-पढ़ते अनायास ही अपनी युवावस्था के दिनों में लौट जाता है और अपने आपको उपन्यास के इन पात्रों के साथ कालेज परिसर में आयोजित विभिन्न एक्टीविटीज में अपनी भागीदारी निभाता नजर आता है। यह अद्भुत उपन्यास पाठक को अनायास ही अपने कालखण्ड का साक्षी बना लेता है तब पढ़ते हुए लगता है “कहीं यह लेखक की आप-बीती तो नहीं (?) क्योंकि मात्र कल्पना से कुछ पात्रों के बीच घटित घटना, वार्तालाप, बोले-अबोले भावों का संप्रेषण, व्यंजनापूर्ण संयत, सरल, सहज शब्दों में सूक्ष्मतर अभिव्यक्ति का शब्द चित्रों में रेखांकन किसी कुशल अभ्यस्त चितेरे द्वारा ही संभव है।
इस पूरे उपन्यास में पावन प्रेम का दर्शन होता है। तँवर जी ने इसे “गुड़हल के फूल सा निर्गन्ध मन” कहा है। वेदना, संवेदना, भावुकता, संयोग, वियोग, संस्कार आदि सब मन के सागर में समा जाते हैं।
पूरे उपन्यास में तीन प्रमुख पात्र हैं, रामप्रकाश, वैदेही व शिप्रा। यह उपन्यास प्रेम त्रिकोण की एक बेमिसाल प्रेम कथा है। पाठक के मानसपटल पर बरबस ही कृष्ण, राधा और रुक्मिणी की तस्वीरें उभरती हैं, यह बिल्कुल कुछ कुछ वैसा ही त्रिकोण है जिसमें सभी पात्र एक दूसरे के लिए त्याग और समर्पण के लिए बिना किसी लिप्सा के उद्दत नजर आते हैं।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2024 |
| Pulisher |











Reviews
There are no reviews yet.