Vanchiton Ke Pravakta Shivmurti
₹895.00 ₹795.00
- Description
- Additional information
- Reviews (0)
Description
वंचितों के प्रवक्ता शिवमूर्ति
प्रेमचंद और फणीश्वरनाथ रेणु के बाद गाँव की धूल माटी को, रेखा-रेखा को शब्दों में भरने का काम संजीव और शिवमूर्ति ने किया है। कभी ‘भारत माता ग्रामवासिनी’ कहा गया था। आगे गाँव की सच्ची तस्वीर कृतियों के माध्यम से पाठकों को देने का काम शिवमूर्ति ने बहुत ही मेहनत से किया हुआ दिखायी देता है। जिस गति से बदलाव हो रहा है, उस गति को पकड़ने का हुनर शिवमूर्ति के पास है। प्रेमचंद और रेणु के गाँवों को शिवमूर्ति के गाँवों के साथ जोड़कर देखें तो बदलाव स्पष्ट रूप से सामने आता है। आज के गाँवों का बदला हुआ चेहरा, राजनीति, आर्थिक स्थितियाँ, जातियता, किसानों की स्थितियाँ, बेरोजगार युवकों की मानसिकता, रुढ़ियाँ, परम्परा, स्त्रियों के जीवन की सच्ची तस्वीर शिवमूर्ति की कथा साहित्य में दिखायी देती है। शिवमूर्ति का वैशिष्ट है कि उनके कथा साहित्य में जीवन और जगत के सच्चे प्रतिनिधि पात्र होते हैं। अपने आस-पास के जीवंतता को उठाकर वे अपनी कहानी, उपन्यास में भर देते हैं। कभी धूल, गुलाल, कीचड़ और चंदन की अद्वितीय अभिव्यक्ति रेणु में मिलती थी। ठीक वैसा ही शिवमूर्ति में भी मिलता है। जीवन के राग से निस्तेज बने चेहरे, लेकिन बहुत ईमानदारी से जीवन से युद्ध करने वाले चेहरे इनके साहित्य में मिलेंगे। किसानों के घर-आँगन को, उनके टूटे फूटे घर को, बूंद की ओस से वर्षों से प्रतिक्षित आँखों को, टूटते-बिगड़ते सपनों को वे अपने लेखन का विषय बनाते है। लोकमानस के जीवन अंगड़ाई को वे बारीकी से देखते हैं। ग्लोबल युग में गाँव की जिंदगी शापित बन गयी है। कभी पर्यावरण से तो कभी व्यवस्था से मुकाबला करती जमात हारने का नाम नहीं लेती। उनकी रचनाओं में अवध का गाँव, लोक-साहित्य और लोक-संस्कृति सांस लेती है। शिवमूर्ति को पढ़ते समय शब्द-शब्द सत्य लगता है। यही विश्वसनीयता जनतांत्रिक मूल्यों की स्थापना करती है।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Hardbound |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2019 |
| Pulisher |











Reviews
There are no reviews yet.