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वयं रक्षामः
‘वयं रक्षाम:’ में प्राग्वेदकालीन जातियों के सम्बन्ध में सर्वथा अकल्पित–अतर्कित नई स्थापनाएं हैं, मुक्त सहवास है, विवसन विचरण है, हरण और पलायन है। शिशन देव की उपासना है, वैदिक–अवैदिक अश्रुत मिश्रण है। नर–मांस की खुले बाजार में बिक्री है, नृत्य है, मद है, उन्मुख अनावृत यौवन है। यह सब मेरे वे मित्र कैसे बर्दाश्त करेंगे भला, जो अश्लीलता की संभावना से सदा ही चैंकायमान रहते हैं।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2020 |
| Pulisher |











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