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Description
यहीं कहीं था घर
‘यहीं कहीं था घर’ में वरिष्ठ कथाकार सुधा अरोड़ा के दो लघु उपन्यास हैं। ‘घर एक -यहीं कहीं था घर’ में रोजमर्रा की टुकड़ा–टुकड़ा कहानियों को लेकर गूंथे गए इस कथानक की जमीन को भारत के हर वर्ग का पाठक अपने इर्द–गिर्द और अपने माहौल में महसूस कर सकता है। सभी चरित्र चौका देने की हद तक अपने लगते हैं। बेटियों पर खूब लाड़–प्यार जताते हुए भी, उन्हें उनकी सही दिशा देने की एक अंतर्धारा बड़े बारीक अंदाज में सतह से नीचे चलती है। सुधा अरोड़ा ने घर और समाज की चौखट पर दिन–रात संघर्षशील स्त्री के विविध पक्षों पर भी खुद को एकाग्र किया है और अपनी अभिव्यक्ति के लिए नए मुहावरे और नए शिल्प की संरचना की है। अपने समय के निर्मम और बीहड़ प्रश्नों को चिह्नित करने, उनमें निहित मंशाओं को उघाड़ने के लिए वे सतत एक मुठभेड़ में संलग्न रही हैं। ‘घर दोµयह रास्ता उसी अस्पताल को जाता है – ‘चाइल्ड अब्यूज’ जैसी विश्वव्यापी समस्या को लेकर एक बच्चे की त्रासदी की मार्मिक कथा है। अपने ही मां–बाप द्वारा जाने-अनजाने बढ़ते बच्चे पर की गई निर्मम हिंसा का लेखिका द्वारा बेबाक बेलौस बयान कई ऐसे परिवारों के जख्मों को हरा कर देगा जो इस अनकही, अनचाही त्रासदी को बहुत नजदीक से देख चुके हैं। सुधा अरोड़ा के ये दो लघु उपन्यास पाठक के मनोजगत में चुपके से प्रवेश कर उनके मन को गहरे स्पर्श करते हैं। समाज की ज्वलंत समस्याओं पर आधारित यह उपन्यास ऐसे सार्थक लेखन की पहल है जिसे केवल सुधा अरोड़ा ही लिख सकती हैं।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Pages | |
| Publishing Year | 2024 |
| Pulisher | |
| Language | Hindi |











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