Yoga Vasistha-1-2

Sale

Yoga Vasistha-1-2

Yoga Vasistha-1-2

900.00 899.00

In stock

900.00 899.00

Author: TEJ KUMAR BOOK DEPOT PVT. LTD.

Availability: 2 in stock

Pages: 1759

Year: 2020

Binding: Hardbound

ISBN: 0000000000000

Language: Hindi

Publisher: TEJ KUMAR BOOK DEPOT PVT. LTD.

Description

योग वाशिष्ठ – 1-2

श्री परमात्मने नमः।

भूमिका

उस ईश्वर सच्चिदानंद घन परमात्मा को धन्यवाद है कि जिसने संसार को उत्पन्न करके अपने प्रकाश के लिए वेदांत आदि विद्याएँ बनाईं, जिनमें अनेक प्रकार के शास्त्र और मत प्रकट किए हैं और जो अनेक प्रकार की वार्त्तायें संयुक्त हैं। कोई तो कर्म की प्रधानता मानते हैं, कोई ज्ञान को श्रेष्ठ जानते हैं और कोई कहते हैं कि उपासना ही मुक्ति का हेतु है, परन्तु इस पुस्तक में कर्म और ज्ञान दोनों की प्रधानता ली गई है। श्री अगस्त्यजी महाराज ने श्री मुख से वर्णन किया है कि न केवल कर्म ही मोक्ष का कारण है और न केवल ज्ञान ही से मोक्ष होता है बल्कि दोनों मिलकर ही मोक्ष की सिद्धि कर सकते हैं, क्योंकि अन्तःकरण निर्मल हुए बिना केवल ज्ञान से ही मुक्ति नहीं होती। कर्म करने से अन्तःकरण शुद्ध होता है फिर ज्ञान उत्पन्न होता है तब मुक्ति होती है। जैसे पक्षी आकाश में दोनों पंखों से उड़ता है वैसे ही मोक्ष साधन के लिए कर्म और ज्ञान दोनों ही आवश्यक हैं। इस पुस्तक में विशेष करके ज्ञान वार्त्ता विषयक श्री परमात्मा रूप दशरथ कुमार आनन्दकन्द श्रीरामचन्द्र और जगद्‌गुरु वशिष्ठजी का संवाद है। इसके धारण करने से मुक्ति होती है। मोक्ष मार्ग के दिखाने को यह पुस्तक दीपक रूप है और ज्ञान और योग की तो स्वरूप ही है। इसके प्रति वाक्य और प्रतिपद से बोध होकर अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है। कलियुग के जीवों के उद्धार के निमित्त आदिकवि विद्वच्छिरोमणि वाल्मीकिजी ने इसको संस्कृत पद्य में निर्माण किया और इसके द्वारा संसार सागर के तरने के निमित्त आत्मज्ञान रूप परमात्मा को लखाया ये बातें इस पुस्तक के पढ़ने-पढ़ाने से विदित होती हैं।

इस पुस्तक में छः प्रकरण हैं ! प्रथम वैराग्य, द्वितीय मुमुक्षु, तृतीय उत्पत्ति, चतुर्थ स्थिति, पंचम उपशम और षष्ठ निर्वाण। इनमें नामसदृश ही विषय भी हैं।

अब इसके भाषान्तर होने का हाल वर्णन किया जाता है। अनुमानतः डेढ़ सौ वर्ष व्यतीत हुए कि पटियाला नगर नरेश श्रीयुत साहब सिंह जी वरिश की दो बहिनें विधवा हो गई थीं इसलिए उन्होंने साधु रामप्रसादजी निरंजनी से कहा कि श्रीयोगवाशिष्ठ जो अति ज्ञानामृत है सुनाओ तो अच्छी बात हो। निदान उन्होंने योगवाशिष्ठ की कथा सुनाना स्वीकार किया और उन दोनों बहिनों ने दो गुप्त लेखक बैठा दिये। ज्यों-ज्यों पण्डितजी कहते थे वे प्रत्यक्षर लिखते जाते थे। जब इसी तरह कुछ समय में कथा पूर्ण हुई तो यह ग्रन्थ भी तैयार हो गया। इसमें कथा की रीति थी, कुछ उल्थे का प्रकार न था और पंजाबी शब्द मिले हुए थे। प्रथम यह ग्रन्थ ऐसा ही बम्बई नगर में अगहन संवत् १६२२ में छपा। जब इसका इस भाँति प्रचार हुआ और ज्ञानियों को कुछ इसका सुख प्राप्त हुआ तो चारों ओर से यह इच्छा हुई कि यदि पंजाबी-बोलियाँ और इबारत सुधारकर यह पुस्तक छापी जावे तो अति उत्तम हो। तथाच श्रीमान् मुंशी नवल किशोर जी ने वैकुण्ठवासी पंडित प्यारेलाल रुग्गू कश्मीरी को आज्ञा दी और उन्होंने बोलियाँ बदलकर और जहाँ-तहाँ की इबारत सुधारकर उनकी आज्ञा का प्रतिपालन किया।

आशा है कि पाठकगण इसे देखकर बहुत प्रसन्न होंगे।

Additional information

Authors

Binding

Hardbound

ISBN

Language

Hindi

Pages

Publishing Year

2020

Pulisher

Reviews

There are no reviews yet.


Be the first to review “Yoga Vasistha-1-2”

You've just added this product to the cart: