Gyanranjan

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ज्ञानरंजन

ज्ञानरंजन का जन्म 21 नवम्बर, 1936 को महाराष्ट्र के अकोला ज़ि‍ले में हुआ। प्रारम्भिक जीवन महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में व्यतीत हुआ। उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हुई। 2013 में जबलपुर विश्वविद्यालय द्वारा मानद ‘डॉक्टर ऑफ़ लिटरेचर’ की उपाधि प्रदत्त (मानद डी.लिट.)।

जबलपुर विश्वविद्यालय से सम्बद्ध जी. एस. कॉलेज में हिन्दी के प्रोफ़ेसर रहे और चौंतीस वर्ष की सेवा के बाद 1996 में सेवानिवृत्त।

सातवें दशक के प्रमुख कथाकार। अनेक कहानी-संग्रह प्रकाशित। अनूठी गद्य रचनाओं की एक क़िताब कबाड़खाना बहुत लोकप्रिय हुई। कहानियाँ देश-विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों में उच्चतर पाठ्यक्रमों में पढ़ाई जाती हैं। शान्ति निकेतन से कहानियों का एक संग्रह बांग्ला में अनूदित होकर प्रकाशित। अंग्रेज़ी, पोल, रूसी, जापानी, फ़ारसी और जर्मन भाषाओं में कहानियाँ प्रकाशित।

आपातकाल के आघातों के बावजूद 35 वर्ष निरन्तर विख्यात साहित्यिक पत्रिका ‘पहल’ का संपादन व प्रकाशन। 2 वर्ष के अन्तराल के बाद पुनः प्रकाशित।

सम्मान : ‘सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड’, हिन्दी संस्थान का ‘साहित्य भूषण सम्मान’, म.प्र. साहित्य परिषद का ‘सुभद्रा कुमारी चौहान’ और ‘अनिल कुमार पुरस्कार’, मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग का ‘शिखर सम्मान’ और ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’, भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता का ‘प्रतिभा सम्मान’, ‘शमशेर सम्मान’ और पाखी का ‘शिखर सम्मान’, भारतीय ज्ञानपीठ का अखिल भारतीय ‘ज्ञानगरिमा मानद अलंकरण’, अमर उजाला का ‘शब्द सम्मान’।

आपातकाल के प्रतिरोध में मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग का एक पुरस्कार और मुक्तिबोध फ़ेलोशिप का अस्वीकार।

ग्रीनविच विलेज (न्यूयार्क) में सातवें-आठवें दशक में कहानियों पर फ़िल्म निर्माण। भारतीय दूरदर्शन द्वारा जीवन और कृतित्व पर एक पूरी फ़िल्म। आई.सी.सी.आर. (विदेश मंत्रालय) समेत देश की अनेक उच्चतर संस्थाओं की सामयिक सदस्यताएँ। मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के ज्वलंत वर्षों में लम्बे समय तक उसके महासचिव रहे। हरिशंकर परसाई के साथ राष्ट्रीय नाट्य संस्था ‘विवेचना’ के संस्थापक सदस्य भी रहे।

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