Bhavanishankaro Vande (Manas Chintan – 2)

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Bhavanishankaro Vande (Manas Chintan – 2)

Bhavanishankaro Vande (Manas Chintan – 2)

420.00 410.00

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Author: Sriramkinkar Ji Maharaj

Availability: 5 in stock

Pages: 430

Year: 2014

Binding: Paperback

ISBN: 0

Language: Hindi

Publisher: Ramayanam Trust

Description

भवानीशंकरौ वन्दे (मानस चिन्तन – 2)

।।श्रीराम: शरणं मम।।

निवेदन

सारा भारतीय वाङ्मय भगवान शिव की महिमा से ओतप्रोत है। संस्कृत में ही नहीं तमिल भाषा में भी शिव भक्त आल्वारों की एक महान परम्परा है; जिन्होंने अपनी भावनामयी रचनाओं के द्वारा महादेव की वाङ्मयी अर्चना की है। उत्तर और दक्षिण में वे समान रूप से वंदनीय हैं तथा भारत के अतिरिक्त भी विश्व के अनेकानेक स्थलों में भगवान् रूद्ध की पूजा के प्रमाण प्राप्त होते हैं। देवता और जैत्य दोनों ही समान रूप से जिसके भक्त हैं, वे तो केवल भूत भावन शंकर ही हैं !

श्रीरामचरितमानस में गोस्वामीजी ने भगवान शंकर के अनेक रूपों की ओर संकेत किया है; जो बड़े ही सांकेतिक, प्रेरक और कल्याणकारी हैं। भले ही रामचरितमानस के रचियता के रूप में गोस्वामी तुलसीदास के नाम का प्रयोग किया जाता है, पर इसे स्वयं तुलसीदास जी नहीं स्वीकार करते। उनकी स्पष्ट घोषणा है कि इसकी रचना भगवान शिव के द्वारा की गई। प्रारम्भ में ही –

 रचि महेस निज मानस राखा।

(बा.का./34/11)

कहकर वे उसकी स्पष्ट स्वीकृति देते हैं। और समापन में भी इसी का स्मरण दिलाते हुए वे घोषित करते हैं –

 यत्पूर्वं प्रभुणा कृतं सुकविना भी शम्भुना दुर्गमं

उ.का.अंतिम श्लोक 1/1

वस्तुतः राम साहित्य के अनेकों अध्येताओं की यह धारणा है, कि भगवान राम के संबंध में जो साहित्य प्राप्त है, उसका आदि स्रोत्र आदि कवि महर्षि वाल्मीकि की ‘रामायण’ है। किन्तु स्वयं गोस्वामीजी इस धारणा को स्वीकार नहीं करते। उनका दृढ़ विश्वास है, कि भले ही महर्षि वाल्मीकि आदि कवि हों, किन्तु तात्विक दृष्टि से इसके रचयिता भगवान शिव ही हैं। महर्षि वाल्मीकि की रचना ग्रन्थ के रूप में, लेखनी के माध्यम से प्रगट हुई, किन्तु भगवान शिव के अन्तर्हृदय में यह रचना अनादि काल से रेखांकित थी। उसकी बाह्य अभिव्यक्ति का कारण भगवती उमा बनीं –

रचि महेस निज मानस राखा।

पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा।। (बा.का./34/11)

महर्षि वाल्मीकि की रचना इतिहासपरक है। किन्तु भगवान् शिव ब्रह्म के रूप में श्रीराम का परिचय देना चाहते हैं। वाल्मीकि आदि कवि हैं और श्रीराम अनादि हैं। अनादि राम का प्रतिपादन तो अनादि शिव के द्वार ही सम्भव है। महर्षि वाल्मीकि साधना के द्वारा सिद्धि हैं, ईश्वर हैं ! ईश्वर को छोड़कर ईश्वर का मर्म दूसरा कौन जान सकता है ? इसीलिए गोस्वामी जी उनकी वन्दना आध्यात्मिक रूप में ही करते हैं। प्रारंभ में वन्दना के श्लोकों में इसका संकेत प्राप्त होता है।

भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।

याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धा: स्वान्त: स्थमीश्वरम्।।

(बा.का.-वन्दना-2)

परम प्रकाश प्रभु समस्त प्राणियों के अन्त:करण में विद्यमान है; किन्तु व्यक्ति इसका अनुभव कहां कर पाता है ? परम प्रकाश को भी प्रकाशित करना यही भगवान शिव की अद्भुत भूमिका है ? अखण्ड ज्ञान घन श्रीराम का साक्षात्कार श्रद्धा और विश्वास के माध्यम से ही संभव है। इसीलिए गोस्वामी जी दावे से यह कह सकते हैं कि साधारण व्यक्ति की तो बात ही क्या, सिद्ध जन भी श्रद्धा, विश्वास के अभाव में ईश्वर का साक्षात्कार नहीं कर सकते। मानो किसी वस्तु को देखने के लिए प्रकाश के साथ दृष्टि की आवश्यकता भी अनिवार्य है। अन्धे व्यक्ति को प्रकाशवान सूर्य की वस्तु दिखाने में अक्षम है। यह दृष्टि श्रद्धा और विश्वास के माध्यम से ही प्राप्त होती है।

इसीलिए महर्षि याज्ञवल्कय, राम कथा के पहले महर्षि भरद्वाज को शिव चरित्र सुनाते हैं। मानों वे राम के दर्शन के लिए, जिस दृष्टि की अपेक्षा है, उसे भरद्वाज को प्रदान करते हैं।

मानस चिन्तन के प्रथम खण्ड में भगवान् राम की महिमा और चरित्र के विश्लेषण की चेष्टा की गई। किन्तु बाद में मुझे यह लगा कि यह तो क्रम विपर्यय है, और तब प्रभु की प्रेरणा से इसके परिमार्जन के लिए मानस चिन्तन के द्वितीय खण्ड में भगवान शिव के दिव्य स्वरूप को समझाने का प्रयास किया गया और यह ग्रन्थ सुधि जनों को आकृष्ट कर पाया, इसका मुझे हार्दिक संतोष एवं प्रसन्नता है। यह ग्रन्थ अप्राप्य था। चतुर्थ संस्करण के रूप में इस अभाव की पूर्ति का प्रयास किया जा रहा है।

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Binding

Paperback

Language

Hindi

Pages

Publishing Year

2014

Pulisher

Authors

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