Dhoop Mein Chhipe Shabd

-25%

Dhoop Mein Chhipe Shabd

Dhoop Mein Chhipe Shabd

250.00 188.00

In stock

250.00 188.00

Author: Sanjay Parikh

Availability: 5 in stock

Pages: 160

Year: 2008

Binding: Hardbound

ISBN: 9788181437914

Language: Hindi

Publisher: Vani Prakashan

Description

धूप में छिपे शब्द

दसियों वर्षों का, जीवन के अन्तरंग से जुड़ा. अनुभवों और जिज्ञासाओं के मध्य धूप-छाँव का एक खेल सा है, जो इन कविताओं में छुपा है। कई सोपान हैं, जो समय और परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में, दुख-सुख, चिंताएँ, आशायें-निराशायें, ईहायें-ईप्सायें, विरोध-प्रतिरोध, लक्ष्य, प्रेम आदि-आदि, को कविताओं में इंगित करते हैं। एक वृहद् चेतना उन सोपानों को एक दूसरे से जोड़ती है। हम सभी इन संप्रेषणों से गुजरते हैं। कुछ इन्हें देख पाते हैं कुछ नहीं। किसी के लिये ये रहस्य बन जाते हैं, किसी के लिए रस। कोई इसमें गुह्य अर्थ तलाशता है तो कोई गीत बनाता है। कोई सामाजिक तथ्यों के मूल्य टटोलता है तो कोई उन मूल्यों का अर्थ, जीवन और प्रकृति के संदर्भ में खोजता है। कोई कहता है क्या है इन सबका सत्य इस संसृति के भीतर और स्वयं के परिप्रेक्ष्य में ?

कवित्व इन सब के बीच उपजी एक जिज्ञासा है, एक भाव है। कहीं वह व्यक्ति और समाज के स्तर पर और उनके बीच के सम्बन्धों को समझने का प्रयत्न करता है तो कहीं एक व्यक्ति और उसके भीतर पैठे विचारों और चेतनाओं के गुंजलक को उकेरता, अपनी ही बात कहता है। कभी वो स्मृतियों में डूबी बातों और परम्पराओं में उलझा रहता है, कभी सुलझा-सा या न समझते हुये भी असम्पृक्त साक्षीभाव से उसे देखता है। कवि का सृजन उसी भाव के अनुरूप ढलता रहता है। कवि कोई समाधान नहीं ढूंढता, कोई निष्कर्ष नहीं निकालता, बस कहता है। कवि जितना सरल भाव से, उस सृजनात्मकता से जुड़ा रहता है, उतना ही निखार उसके निर्माण में आता है। कवि स्वयं के अर्थ में यानि सच्चे अर्थ में तभी तक कवि रहता है जब तक कि उसकी संवेदना उस सृजनात्मक चित्त में ठहरी हुई वही कहती है जो अन्तर से निकलता है और एक रूप लेता है वह नहीं जो शब्द-शिल्प, उससे उसके कवि जानने पहचानने के कारण, लिखवाता है। इस तरह हम देखें तो कवि के कृतित्व को कोई रहस्यवाद, सौन्दर्यवाद, छायावाद, आध्यात्मवाद और प्रयोगवाद में विभाजित नहीं कर सकता। छंदबद्ध कविता और छंदमुक्त कविता का विभाजन भी कृत्रिम है। कोई उस रूप में पुराना कवि नहीं, कोई नया कवि नहीं। जब छंद बस छंद लिखने के लिये रह जाते हैं तो कविता मर जाती है, इसी तरह जब नई कविता बस पुरातन को तोड़ने के लिये या अपने को सिर्फ छंदमुक्त प्रमाणित करने के लिये लिखी जाती है. उसकी सृजन-श्रेयता समाप्त हो जाती है। महत्व है-किसी भी स्तर से उठती संवेदना के मर्म को पहचानना, उसे खोजना, उसे जानना और आतुरता की उष्णता में उसे एक रूप देना। ऐसा कर कवि फिर एक नई तलाश में निकल पड़ता है या कि फिर कोई तलाश उसे अनायास ही पकड़ लेती है। विश्लेषण करना कवि का धर्म नहीं, सृजन की श्रृंखला में उसे यह भाता भी नहीं। यदा कदा रुककर वह देखता है अपनी सृजना को तो कभी आश्चर्य में डूब जाता है और कभी अपने को कोसता अपनी कृति देख लज्जान्वित अनुभव करता है। यही ऊब डूब उसको कवि भी बनाये रखती है। उसे संतोष तभी होता है जब शब्द उसके अनुभव को एक रूप दे पाते हैं, बिना उस अनुभव के सौन्दर्य को छेड़े हुए।

Additional information

Authors

Binding

Hardbound

ISBN

Language

Hindi

Pages

Publishing Year

2008

Pulisher

Reviews

There are no reviews yet.


Be the first to review “Dhoop Mein Chhipe Shabd”

You've just added this product to the cart: