Gyan Deepak – 2

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Gyan Deepak – 2

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Author: Sriramkinkar Ji Maharaj

Availability: 10 in stock

Pages: 188

Year: 2014

Binding: Paperback

ISBN: 0

Language: Hindi

Publisher: Ramayanam Trust

Description

ज्ञान दीपक – 2

।। श्रीराम: शरणं मम ।।

प्रथम

सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई।

जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई।।

जप तप ब्रत जम नियम अपारा।

जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा ।।

तेई तृन हरित चरै जब गाई।

भाव बच्छ सिसु पाई पेन्हाई।।

नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा।

निर्मल मन अहीर निज दासा।

परम धर्ममय पय दुहि भाई।

अवटै अनल अकाम बनाई।।

तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै।

धृति सम जावनु देइ जमावै।।

मुदिताँ मथै बिचार मथानी।

दम अधार रजु सत्य सुबानी।।

तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता।

बिमल बिराग सुभग सुपुनीता।।

 

जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ।

बुद्धि सिरावै ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ।। 7/117

 

आइए ! एकाग्र और शान्तचित्त से इस प्रसंग को हृदयंगम करने की चेष्टा करें।

व्यक्ति के समक्ष सबसे बड़ी समस्या सुख की है। व्यक्ति सुख चाहता है, परन्तु न चाहते हुए भी उसके जीवन में दु:ख आ जाता है। प्रस्तुत प्रसंग में इसी समस्या के समाधान के लिए एक बड़ी सांकेतिक भाषा का प्रयोग किया गया है। यदि आपको किसी गाँठ को सुलझाना हो तो उसके लिए प्रकाश चाहिए। यह गाँठ हमारे भीतर है, इसलिए इसे सुलझाने के लिए भीतर प्रकाश की आवश्यकता है, परन्तु हम उजाला कर रहे हैं बाहर। हमारा समस्त पुरुषार्थ केवल बाहर का अन्धकार मिटाने के लिए ही होता है। ज्ञानदीपक प्रसंग में संकेत किया गया है कि केवल बाहरी प्रकाश के लिए किसी भी प्रयत्न की आवश्यकता है। इसका अभिप्राय यह है कि जब तक व्यक्ति स्वयं अपने अन्तर्हृदय में प्रवेश नहीं करता और वहाँ जो अन्धकार छाया हुआ है, उसको मिटाने के लिए जब तक व्यक्ति ज्ञान का दीपक नहीं जलाता, तब तक विभिन्न प्रकार के प्रयत्न केवल श्रम मात्र ही हैं।

बाहर के प्रकाश के लिए तो हम दीपक या बिजली का प्रयोग करते हैं और प्रकाश प्राप्त कर लेते हैं, परन्तु भीतर के प्रकाश के लिए किस पद्धति से प्रकाश किया जाय, यह जानना परमआवश्यक है। ज्ञानदीपक प्रसंग में यही बताया गया है। हमारे अन्तर्हृदय में जहाँ गहरा अन्धकार छाया हुआ है, उस अन्तर्हृदय में ही दीपक जलायें और दीपक जला करके जो जड़ एवं चेतन की एक गाँठ पड़ गयी है, उसे सुलझाने की चेष्टा करें। अँधेरे में उसे सुलझाने के प्रयास में उस गाँठ के और भी उलझ जाने की संभावना है। हमारे अन्तर्हृदय में किस प्रकार प्रकाश हो, इसका वर्णन इस ज्ञानदीपक प्रसंग में किया गया है।

गोस्वामी ने इसके लिए जो साधना पद्धति बतायी है, उसकी ओर इस प्रसंग में संकेत किया गया है। वे कहते हैं कि अन्तर्हृदय के प्रकाश के लिए दीपक की आवश्यकता है और उस दीपक में जो घी हो, वह गाय के दूध से बना शुद्ध घृत होना चाहिए। क्या तेल अथवा भैंस के घी का दीपक यदि जलायें तो क्या प्रकाश नहीं होगा ? गोस्वामीजी ने गाय के घी के दीपक के लिए जो आग्रह किया है, उसका सांकेतिक अर्थ क्या है ? बुद्धि को प्रकाश का प्रतीक माना जाता है। बुद्धिमत्ता तो अनगिनत व्यक्तियों में देखी जाती है, केवल बुद्धि की चमक से ही अन्तर्हृदय में प्रकाश हो जायगा यह संभव नहीं।

मानो यहाँ यह सूत्र दिया गया है कि केवल बुद्धि की ही नहीं, अपितु पवित्र बुद्धि की आवश्यकता है और पवित्रता का प्रतीक हम गाय को मानते हैं। इसलिए यहाँ पर एक क्रम का वर्णन किया गया है कि पहले जब व्यक्ति पर भगवान् की कृपा होती है तो उसके अन्त:करण में सात्त्विक श्रद्धा का उदय होता है और सात्त्विक श्रद्धा ही मानो गाय है। जैसे कितनी भी अच्छी गाय हो, जब तक उसे चारा नहीं खिलायेंगे, तब तक वह दूध नहीं देगी, उसी प्रकार से श्रद्धा होते हुए भी जब तक हमारे जीवन में सत्कर्म नहीं होगा, तब तक गाय दूध देने में समर्थ नहीं होगी तो यह कहा गया है कि सात्त्विक श्रद्धा चाहिए, उसको सत्कर्म का चारा खिलाने की आवश्यकता है और फिर इसके बाद बछड़ा चाहिए, तो कहा गया कि साधक के हृदय में जो भाव है, वही इस सात्त्विक श्रद्धा का बछड़ा है।

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Binding

Paperback

Language

Hindi

ISBN

Pages

Publishing Year

2014

Pulisher

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