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Description
मकान
नारायण एक सितारवादक है। जीविका के लिए वह परिवार को दूसरी जगह छोड़कर अपने पुराने शहर में आता है और यहीं से मकान की तलाश शुरू होती है। एक दौरान उसका सितार से साथ छूटने लगता है; और अब वह जिनके साथ जुड़ता है उसमें मकान बाँटनेवाला अफसर है कर्मचारी-यूनियन का नेता बारीन हालदार है, पुरानी शिष्या श्यामा है, वेश्या-पुत्री सिम्मी है और वे तमाम तत्त्व हैं जो जिंदगी के बिखराव को तीखा बनाते है।
इस संघर्ष शोषण और अव्यवस्था के दौर से गुजरते हुए तीक्ष्ण प्रतिक्रियाएँ व्यक्त होती हैः ‘मजाक देखा तुमने ? हम आसमान में उपग्रह उड़ा सकते हैं पर इस निगम के सीवेज के लिए मशीनों का जुगाड़ नहीं कर सकते। यहाँ सीवेज की सफाई के लिए तो बलि के बकरे चाहिए, पर बिस्कुट बनाने के लिए यहाँ से नयी मशीनें मौजूद हैं…..’‘जैसे कुछ तांत्रिक लोग शराब पीने से पहले माँ काली के नाम पर दो-चार बूँटें जमीन पर छिड़क देते हैं; वैसे ही हाउसिगं की पूरी-की-पूरी स्कीम गटकने से पहले चतुर लोग हरिजनों के नाम दस-बीस प्लाट निकाल देते हैं…’ उपन्यास का अंत सर्वथा अप्रत्याशित मोड़ पर होता है।
‘मकान’ यशस्वी कथाकार श्रीलाल शुक्ला की बहुप्रशंसित कृति है। वस्तुतः की पृष्ठभूमि में कलाकार के जीवन की आकांक्षाओं, जिम्मेदारियों, विसंगतियों और तनावों को केन्द्र बनाकर लिखा गया हिंदी में अपनी तरह का यह पहला उपन्यास है।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Pages | |
| Publishing Year | 2023 |
| Pulisher | |
| Language | Hindi |











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