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Description
मानस मंथन-1
प्रथम प्रवचन
भगवान् की महती अनुकम्पा से यह सुअवसर प्राप्त हुआ है कि उनके चरित्र की कुछ चर्चा आप लोगों के बीच कर सकूँ। आइए ! सबसे पहले गोस्वामीजी की भगवान् राम के प्रति जो दृष्टि है, उस पर विचार कर लें। गोस्वामीजी की जो मान्यताएँ हैं, उन्हें रखने के पश्चात् मैं आपके समक्ष भगवान् श्रीराम के चरित्र की एक संक्षिप्त झाँकी रखने का प्रयास करूँगा।
पूज्य स्वामी आत्मानन्दजी ने पृष्ठभूमि के रूप में उस दृष्टि का संकेत आपको दिया है। उन्होंने उस पद का उद्धरण भी आपको दिया है जिसमें कहा गया है कि वाल्मीकि ही तुलसी के रूप में अवतरित होते हैं। वाल्मीकि तुलसी के रूप में क्यों अवतरित होते हैं, यदि इस प्रश्न पर विचार करें तो हमारा ध्यान चला जाता है श्रीमद्भागवत के एक प्रसंग की ओर। भगवान् व्यास विपाशा नदी के तट पर गम्भीर मुद्रा में विराजमान थे। देवर्षि नारद उनके पास आए। व्यासजी ने उनका स्वागत किया। उसके पश्चात बड़े ही सांकेतिक शब्दों में देवर्षि नारद ने भगवान् व्यास से पूछा—आपने महाभारत जैसे महान् ग्रन्थ की रचना की है जो ज्ञान का अप्रतिम कोष है। आपको इस रचना के पश्चात् तो सन्तोष एवं शान्ति की अनुभूति हो रहीं होगी ? आप स्वयं में कृतकृत्यता और पूर्णता का अनुभव कर रहे होंगे ? देवर्षि के इस प्रश्न के उत्तर में भगवान् व्यास ने कहा कि महाभारत की रचना को रचना की दृष्टि से महत् मानते हुए भी मैं ऐसा अनुभव नहीं करता कि उसकी रचना के बाद मुझे समग्र शान्ति या सन्तोष का अनुभव हुआ हो। उन्होंने देवर्षि से पूछा कि इसका कारण क्या है ?
देवर्षि नारद ने कहा कि महाभारत की रचना उत्कृष्ट होते हुए भी आपने जिस दृष्टि से वह रचना की है, समग्र अर्थों में वह आपको सन्तोष और शान्ति नहीं दे सकती है। आप पुनः श्रीकृष्ण के चरित्र की रचना करें और उस रचना के पश्चात् आपको सन्तोष एवं शान्ति का अनुभव होगा। और फिर देवर्षि की प्रेरणा से भगवान् व्यास ने श्रीमद्भागवत की रचना की, तब उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि उस रचना के पश्चात उन्हें परम शान्ति की उपलब्धि हुई। बड़ी अद्भुत बात है कि महाभारत इतना महत् ग्रन्थ है, इतना अप्रतिम है, पर उसके पश्चात् भी भगवान् व्यास को ऐसा प्रतात होता है कि उन्हें सन्तोष की उपलब्धि नहीं हुई, इसलिए वे उसके बाद श्रीमद्भागवत की रचना करते हैं। तो, मैं कहूँगा कि जिस प्रेरणा से महर्षि व्यास ने महाभारत के बाद श्रीमद्भागवत की रचना की, उसी प्रेरणा से वाल्मीकि भी तुलसी के रूप में अवतरित हो गए। और तब वे भगवान् राम के चरित्र को नई दृष्टि से सामने रखते हैं। महर्षि व्यास ने तो अपना कार्य तत्काल कर लिया जबकि महर्षि वाल्मीकि ने उसके लिए कलियुग का चुनाव किया। लेकिन दोनों स्थानों पर दृष्टि एक ही है। भगवान् श्रीकृष्ण महाभारत में भी हैं और श्रीमद्भागवत में भी किन्तु रचनाकार की दृष्टि दोनों जगह अलग-अलग है।
वाल्मीकि रामायण के प्रतिपाद्य हैं श्रीराम। वाल्मीकि तुलसीदास के रूप में अवतरित होकर जब श्रीराम के चरित्र का वर्णन करते हैं तब भी उनके ग्रन्थ के नायक श्रीराम हैं, पर दोनों में दृष्टि का पार्थक्य है। जो बात महाभारत और श्रीमद्भागवत की रचना को अलग बनाती है, वह वाल्मीकि एवं तुलसीकृत रामायण की तुलना करने पर स्पष्ट हो जाती है। वह दृष्टि क्या है जिसकी ओर पूज्य स्वामी आत्मानन्दजी ने संकेत किया है ?—वह है ऐतिहासिक दृष्टि और भावदृष्टि। महाभारत इतिहास को प्रधानता देता है तथा श्रीमद्भागवत भाव को। और यही बात रामचरितमानस के विषय में है। वाल्मीकि का काव्य इतिहास-प्रधान है, और जब वे तुलसीदास के रूप में रामचरितमानस की रचना करते हैं तो भाव-प्रधान हो जाता है।
इतिहास और भाव की दृष्टि में अन्तर कहाँ है ? इतिहास की दृष्टि व्यक्ति के ज्ञान की वृद्धि तो कर सकती है पर व्यक्ति के अन्तःकरण को सन्तुष्ट नहीं कर सकती। वह तो भावदृष्टि है जो व्यक्ति के अन्तःकरण को सन्तोष या शान्ति का अनुभव कराती है। वाल्मीकि ने भगवान् राम का वर्णन भले ही सांकेतिक रूप में किया हो किन्तु वे मुख्य रूप से मानव चरित्र की दृष्टि से, मानव के रूप में श्रीराम का प्रतिपादन करते हैं।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2023 |
| Pulisher |











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