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Manas Manthan-4 (Shri Lakshman Charitra)
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Author: Sriramkinkar Ji Maharaj
Pages: 182
Year: 2018
Binding: Paperback
ISBN: 0000000000000
Language: Hindi
Publisher: Ramayanam Trust
मानस मंथन-4 (श्री लक्ष्मण चरित्र)
प्रथम व्याख्यान
गोस्वामी तुलसीदास श्री लक्ष्मणजी की वन्दना करते हुए कहते हैं।
बंदउँ लक्षिमन पद जल जाता।
सीतल सुभग भगत सुख दाता।।
रघुपति कीरति बिमल पताका।
दंड समान भयउ जस जाका।।
सेष सहस्रसीस जग कारन।
जो अवतरेउ भूमि भय टारन।।
सदा सो सानुकूल रह मो पर।
कृपासिन्धु सौमित्रि गुनाकर।। 1/16/5-8
लोग लक्ष्मण जी के चरित्र तथा व्यक्तित्व में विरोधाभास देखते हैं। गोस्वामी जी की दृष्टि में भी यह विरोधाभास था और इसी के स्पष्टीकरण के लिए उन्होंने श्री लक्ष्मणजी की वन्दना का थोड़ा अधिक विस्तार किया। उनकी वन्दना में उपर्युक्त चार पंक्तियों का उपयोग किया गया है, जबकि भरतजी की वन्दना में दो ही पंक्तियां लिखी गई हैं।
प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना।
जासु नेम ब्रत जाइ न बरना।।
राम चरन पंकज मन जासू।
लुबुध मधुप इव तजइ न पासू।।1/16/3-4
शत्रुध्नजी की वन्दना भी एक पंक्ति में कर ली गई-
रिपुसूदन पद कमल नमामी।
सूर सुसील भरत अनुगामी।।1/16/9
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2018 |
| Pulisher |
श्रीरामकिंकर जी महाराज
जन्म : 1 नवम्बर 1924
देहावसान : 9 अगस्त 2002
जन्म से ही होनहार व प्रखर बुद्धि के आप स्वामी रहे हैं। आपकी शिक्षा-दीक्षा जबलपुर व काशी में हुई। स्वभाव से ही अत्यन्त संकोची एवं शान्त प्रकृति के बालक रामकिंकर अपनी अवस्था के बच्चों की अपेक्षा कुछ अधिक गम्भीर थे। एकान्तप्रिय, चिन्तनरत, विलक्षण प्रतिभावाले सरल बालक अपनी शाला में अध्यापकों के भी अत्यन्त प्रिय पात्र थे। बाल्यावस्था से ही आपकी मेधाशक्ति इतनी विकसित थी कि क्लिष्ट एवं गम्भीर लेखन, देश-विदेश का विशद साहित्य अल्पकालीन अध्ययन में ही आपके स्मृति पटल पर अमिट रूप से अंकित हो जाता था। प्रारम्भ से ही पृष्ठभूमि के रूप में माता-पिता के धार्मिक विचार एवं संस्कारों का प्रभाव आप पर पड़ा।

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