Manas Manthan-4 (Shri Lakshman Charitra)
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Description
मानस मंथन-4 (श्री लक्ष्मण चरित्र)
प्रथम व्याख्यान
गोस्वामी तुलसीदास श्री लक्ष्मणजी की वन्दना करते हुए कहते हैं।
बंदउँ लक्षिमन पद जल जाता।
सीतल सुभग भगत सुख दाता।।
रघुपति कीरति बिमल पताका।
दंड समान भयउ जस जाका।।
सेष सहस्रसीस जग कारन।
जो अवतरेउ भूमि भय टारन।।
सदा सो सानुकूल रह मो पर।
कृपासिन्धु सौमित्रि गुनाकर।। 1/16/5-8
लोग लक्ष्मण जी के चरित्र तथा व्यक्तित्व में विरोधाभास देखते हैं। गोस्वामी जी की दृष्टि में भी यह विरोधाभास था और इसी के स्पष्टीकरण के लिए उन्होंने श्री लक्ष्मणजी की वन्दना का थोड़ा अधिक विस्तार किया। उनकी वन्दना में उपर्युक्त चार पंक्तियों का उपयोग किया गया है, जबकि भरतजी की वन्दना में दो ही पंक्तियां लिखी गई हैं।
प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना।
जासु नेम ब्रत जाइ न बरना।।
राम चरन पंकज मन जासू।
लुबुध मधुप इव तजइ न पासू।।1/16/3-4
शत्रुध्नजी की वन्दना भी एक पंक्ति में कर ली गई-
रिपुसूदन पद कमल नमामी।
सूर सुसील भरत अनुगामी।।1/16/9
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2018 |
| Pulisher |











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