Manas Rog – 2

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Manas Rog – 2

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Author: Sriramkinkar Ji Maharaj

Availability: 5 in stock

Pages: 224

Year: 2019

Binding: Paperback

ISBN: 0000000000000

Language: Hindi

Publisher: Ramayanam Trust

Description

मानस रोग – 2

भूमिका

प्रस्तुत पुस्तक ‘मानस-रोग’ को मिलाकर 4 भागों में प्रकाशित होगी। इसके तीन खण्ड इस समय तैयार होकर आपके समक्ष हैं। इस श्रृंखला का एक खण्ड ‘मानस चिकित्सा’ नाम से प्रकाशित हुआ था। ये  प्रवचन ‘रामकृष्ण मिशन’, विवेकन्नद आश्रम, रायपुर में हुए थे। ब्रह्मलीन स्वामी श्री आत्मानन्दजी महाराज न केवल एक श्रेष्ठ वक्ता थे अपितु वे उतने ही उच्चकोटि के श्रोता भी थे। बार-बार तत्कालीन श्रोता समाज को सम्बोधित करते हुए कहते थे। कि ये  प्रवचन मेरी साधना हैं। साथ ही वे मानव के उन प्रसंगों को प्रवचन के लिए मेरे सक्षम चुनते थे। जो प्रवचन परम्परा से बिलकुल भिन्न होते थे।

‘मानस-रोग’ प्रसंग रामचरितमानस के उन गम्भीरतम प्रसंगों में से एक हैं जिनकी चर्चा प्रायः कथा–मंचों से होने की परम्परा नहीं रही है। रायपुर आश्रम में नौ-नौ के पाँच सत्रों में 45 प्रवचन इस विषय पर हुए थे। स्वामी महाराज की तो इच्छा थी कि लगातार एक वर्ष तक रायपुर में रहकर मैं इस विषय पर प्रवचन करूँ। पर मेरी व्यस्तता और लगातार बने कार्यक्रमों की कतार में उनका यह प्रस्ताव तो मैं पूर्ण नहीं कर सका, पर पाँच वर्षों तक एक ही विषय को लेकर प्रभु ने कुछ अनोखी चर्चा अवश्य कराई।

कागभुशुण्डिजी के द्वारा पक्षिराज गरुण को सम्पूर्ण रामकथा सुनाने के बाद भुशुण्डिजी ने जब गरुड़जी से कहा कि यदि आप और भी कुछ सुनना चाहते हैं तो बताइए तब गरुड़जी ने कागभुशिण्डजी से सात प्रश्न किए। जिनमें अन्तिम प्रश्न है कि मानस रोग कहहु समुझाई ‘मानस-रोग’ क्या हैं और उनके लक्षण और चिकित्सा क्या है ? इन प्रश्नों के पीछे गोस्वामीजी की महती और कल्याणकारी भावना थी। मानो वे रामकथा को व्यक्ति के जीवन से जोड़ना चाहते थे। सब कुछ सुन लेने के पश्चात भी उन्हें यह लगा कि रामचरित मानस केवल एक मनोरंजन का साधन और बुद्धि-विलास बनकर ही न रह जाए, अपितु इसमें मानस का जुड़ना भी आवश्यक है। तभी यह पूर्ण रामचरितमानस होगा। जिस प्रकार अनेक प्रकार के पदार्थों के रहते हुए भी व्यक्ति यदि शरीर से स्वस्थ्य नहीं है तो उनका भोग वह नहीं कर सकता, क्योंकि स्वस्थता के अभाव में वह किये हुए भोजन को पचा ही नहीं सकेगा। और शरीर को किए हुए भोजन का लाभ तभी मिलता है जब वह पूर्ण रूप से पच जाए। इसी प्रकार यदि व्यक्ति का मन स्वस्थ्य नहीं है, मानस-रोगों से ग्रस्त है तो रामचरितमानस में वर्णित पात्रों और उनके चरित्र की व्याख्या को सांसारिक व्याख्या के रूप में ही देखेगा। परिणाम होगा कि उसके जीवन में उस कथा का कोई भी लाभ नहीं होगा। क्योंकि इस कथा के नायक श्रीराम तत्वतः ब्रह्म हैं। और वे लोककल्याण के लिए नर जैसी लीला कर रहे हैं।

सगुण साकार के क्रिया-कलापों की आध्यात्मिकता को समझने के लिए व्यक्ति का मन से स्वस्थ होना  नितान्त आवश्यक है। ‘सरुज सरीर वादि बहु भोगा’ की अर्धाली में इसी सत्य की ओर इंगित किया गया है। पर यदि मन ही अस्वस्थ हो तो शरीर की स्वस्थता उसे पूर्णानन्द की ओर नहीं ले जा सकती।

मानस-रोगों के विश्लेषण एवं उनके प्रदर्शन का तात्पर्य एक स्वस्थ्य और आदर्श जीवन की उपलब्धि है। खासकर तब जब विज्ञान ने मनुष्य की वांछित सुख-सुविधाओं को उपलब्ध करा दिया हो, और फिर भी अशान्ति बढ़ती जा रही हो। तब यह निश्चित हो जाता है कि कारण बाहर नहीं अंदर है। कागभुशुण्डि-संवाद के मध्य जीवन के मूलभूत प्रश्नों को बड़ी ही सूक्ष्मता से उभारा गया है। प्रस्तुत पुस्तक में आशा है, पाठकों को मानस-रोगों के सन्दर्भ से कुछ समाधान मिलेगा।

इस ग्रन्थ के प्रकाशन का आर्थिक सहयोग रायपुर के श्री सन्तोषकुमार द्विवेदी ने उठाया है। उनको और उनके परिवार को मेरा हार्दिक आशीर्वाद एवं शुभकामनाएँ। प्रभु की जब विशेष कृपा होती है। तब व्यक्ति के अंतः करण में अर्थ को परमार्थ की दिशा में लगाने की इच्छा उत्पन्न होती है। हमारे यहाँ धन की तीन गति बताई गई हैं- 1. भोग. 2. दान, 3. विनाश। निश्चित रूप से धन की चौथी कोई और गति हो ही नहीं सकती। श्री द्विवेदी का परिवार मेरा शिष्य है। कथा के प्रति इनकी विशेष अभिरुचि का सुपरिणाम है, इनके द्वारा किया जाने वाला यह आर्थिक सहयोग। भगवान भी इनके ऊपर कृपा बनी रहे, यही मेरा आशीर्वाद है।

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Binding

Paperback

ISBN

Language

Hindi

Pages

Publishing Year

2019

Pulisher

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