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Description
नाटक तथा रंग-परिकल्पना
यह पुस्तक मात्र आलोचना-पुस्तक नहीं है, बल्कि नाटक जैसी सशक्त और जटिल विधा के आन्तरिक सूत्रों और रंग-मंच से सम्बद्ध बाह्य सूत्रों के अन्तःसम्बन्ध को पहचानने का एक सार्थक प्रयास है। इसलिए केवल इतिहास, विकास, वर्गोंकरण से बहुत हटकर यहाँ उन मुद्दों से साक्षात्कार किया गया है जो आज नाट्य-जगत् और रंगजगत् में अहम हैं। नाट्यलेखन, रंगकर्म, नाट्यभाषा की सूक्ष्म पकड़ और नाट्यसमीक्षा के सुविकसित रचना-रूप की माँग करता है और साथ ही आज अध्ययन-अध्यापन में भी उसके वैशिष्ट्य और मौलिकता को समझने की आवश्यकता अनुभव करता है। ‘रंग-परिकल्पना’ को आत्मसात करने का जितना दायित्व नाटककार का है, उतना ही रंगकर्मी, समीक्षक और अध्यापक का भी। इस माने में यह पुस्तक हमारे विरोधा-भाषों और दुर्बलताओं से हमारा साक्षात्कार कराती हुई साहित्य और कला में निरन्तर गत्यात्मक, विकसनशील प्रयोगवृत्ति और सृजनधर्मी चेतना को प्रोत्साहित करती है।
नाट्यरूपान्तर और जयशंकर प्रसाद के नाटकों को लेकर जो विवाद और अर्थसंकट उठे हुए है-उन पर यह पुस्तक बेहद सर्जनात्मक दृष्टि से विचार करते हुए अत्यन्त सम्भावनाओं को उजागर करती है। चारों ओर के अन्त-विरोधों और संघर्ष के बीच संवेदना, मौलिकता और नवीन मानदण्डों का अन्वेषण इस पुस्तक की विशेषता है। प्रसाद के ‘एक घूंट’ एकांकी का संशोधित संस्करण, रंगमंच, नाटक के इतिहास, समीक्षा और स्वयं जयशंकर प्रसाद के साहित्य की दृष्टि से इसके महत्व को प्रतिष्ठित करता है।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Text |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 1995 |
| Pulisher |











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