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Description
निषाद बाँसुरी
चन्दनघाट की वृद्धा
मैं इस बीसवीं शताब्दी का एक जीव हूँ। मेरा जन्म जिस देश में हुआ है, उसे लोग हिन्दुस्तान कहते हैं। मुझे लगता है कि जब मैं दर्जा चार में पढ़ता था, तो मेरे साथ एक विचित्र घटना घटी थी। अब इस समय जीवन की उत्तरा फाल्गुनी ऋतु को पार करते समय में उस घटना के बारे में कोई सबूत, प्रमाण, दस्तावेज्त, ताम्रपत्र या शिलालेख तो नहीं पेश कर सकता; पर मुझे जो लगता है कि ऐसा घटित हुआ था, उसे सुना अवश्य सकता हूँ… सुना ही देता हूँ।
कार्तिक अगहन का मास रहा होगा। मुझे अपने मामा के गाँव सात समुन्दर-देवहापार चन्दनघाट जाना पड़ा था, और वह भी अकेले अकेले। माँ ने बताया था कि रन में, वन में, अकेले अकेले चलने में छोटे-छोटे बच्चों के साथ भगवान् रहते हैं। इसी से मैं बिलकुल डरा नहीं और अकेले अकेले मामा के गाँव चन्दनघाट गया। डर की बात ही क्या थी? माँ ने नीम की पतली सींकों की नौका तैयार कर दी, माँ ने आँचल फाड़कर पाल तान दिया था, माँ ने नौका के सीमान्त पर अपना सिन्दूर लगा दिया था, और मैंने उस सींक की नाव पर सवार होकर अकेले-अकेले अपनी यात्रा प्रारम्भ कर दी।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2026 |
| Pulisher |











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