Parampara Ka Mulyankan

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Parampara Ka Mulyankan

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250.00 225.00

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250.00 225.00

Author: Ramvilas Sharma

Availability: 5 in stock

Pages: 252

Year: 2025

Binding: Text

ISBN: 9788126709205

Language: Hindi

Publisher: Rajkamal Prakashan

Description

परम्परा का मूल्यांकन

प्रगतिशीलता के सन्दर्भ में परंपरा-बोध एक बुनियादी मूल्य है, फिर चाहे इसे साहित्य के परिप्रेक्ष्य में रखा-परखा जाय अथवा समाज के दूसरे शब्दों में बिना साहित्यिक परंपरा को समझे न तो प्रगतिशील आलोचना और साहित्य की रचना हो सकती है और न ही अपनी ऐतिहासिक परंपरा से अलग रहकर कोई बड़ा सामाजिक बदलाव संभव है। लेकिन परंपरा में जो उपयोगी और सार्थक है, उसे उसका मूल्यांकन किए बिना नहीं अपनाया जा सकता।

यह पुस्तक परंपरा के इसी उपयोगी और सार्थक की तलाश का प्रतिफलन है। सुविख्यात समालोचक डॉ. रामविलास शर्मा ने जहाँ इसमें हिन्दी जाति के सांस्कृतिक इतिहास की रूपरेखा प्रस्तुत की है, वहीं अपने-अपने युग में विशिष्ट भवभूति और तुलसी की लोकाभिमुख काव्य-चेतना का विस्तृत मूल्यांकन किया है। तुलसी के भक्तिकाव्य के सामाजिक मूल्यों का उद्घाटन करते हुए उनका कहना है कि दरिद्रता पर जितना अकेले तुलसीदास ने लिखा है उतना हिन्दी के समस्त नए-पुराने कवियों ने मिलकर न लिखा होगा। भवभूति के संदर्भ में रामविलासजी का यह निष्कर्ष महत्त्वपूर्ण है कि ‘यूनानी नाटककारों की देव सापेक्ष न्याय-व्यवस्था की जगह देव निरपेक्ष न्याय-व्यवस्था का चित्रण शेक्सपियर से पहले भवभूति ने किया’ और रामायण-महाभारत के नायकों के विषयमें यह कि ‘राम और कृष्ण दोनों श्याम वर्ण के पुरुष हैं’।

वस्तुतः इस कृति में, आधुनिक साहित्य के जनवादी मूल्यों के संदर्भ में, प्राचीन, मध्यकालीन और समकालीन भारतीय साहित्य में अभिव्यक्त संघर्षशील जनचेतना के उस विकासमान स्वरूप की पुष्टि हुई है जो शोषक वर्गों के विरुद्ध श्रमिक जनता के हितों के प्रतिबिम्बित करता रहा है।

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Publishing Year

2025

Pulisher

Language

Hindi

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