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Description
रीति-काव्य की भूमिका
प्रस्तुत पुस्तक रीति-काव्य की भूमिका हिंदी के मूर्धन्य आलोचक डॉ. नगेन्द्र की महत्त्वपूर्ण आलोच्य-कृति है। प्रस्तुत ग्रंथ में लेखक ने रीति-युग की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों का जहां ऐतिहासिक विवेचन किया है, वहां रीति-काव्य के शास्त्रीय आधार का साधारणतः ऐतिहासिक और विशेषतः सैद्धांतिक विवेचन के साथ-साथ रीति-काव्य की सामान्य प्रवृत्तियों का विश्लेषण भी किया है।
हिंदी में रीति-काव्य प्रायः उपेक्षा का ही भागी रहा है। द्विवेदी युग के आलोचकों ने इसको नीतिभ्रष्ट कहकर तिरस्कृत किया; छायावाद के प्रतिनिधि कवि-लेखक इस कविता को अति-ऐन्द्रिय और स्थूल कहकर हेय समझते रहे और आज का प्रगतिशील समीक्षक इसको सामंतवाद की अभिव्यक्ति मानकर प्रतिक्रियावादी कविता कहता है। किंतु डॉ. नगेन्द्र ने शुद्ध साहित्यिक (रस) दृष्टि से ही रीति-काव्य की सामान्य प्रवृत्तियों का प्रस्तुत पुस्तक में विश्लेषण और मूल्यांकन करने का प्रयास किया है।
प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियों के लिए समान रूप से अत्यंत उपयोगी, पठनीय एवं बहुचर्चित पुस्तक। अब तक पुस्तक के अनेक संस्करण प्रकाशित।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2023 |
| Pulisher |











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