Sangeet Ka Itihas Aur Bhartiya Navjagran Ki Samasyayen

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Sangeet Ka Itihas Aur Bhartiya Navjagran Ki Samasyayen

Sangeet Ka Itihas Aur Bhartiya Navjagran Ki Samasyayen

425.00 320.00

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425.00 320.00

Author: Ramvilas Sharma

Availability: 5 in stock

Pages: 252

Year: 2010

Binding: Paperback

ISBN: 9789350002292

Language: Hindi

Publisher: Vani Prakashan

Description

संगीत का इतिहास और भारतीय नवजागरण की समस्याएँ

भूमिका

रामविलास जी की संगीत में गहरी रुचि थी। यह रुचि एक साधारण लेखक आलोचक वाली रुचि नहीं थी, गहरे पैठ कर मोती लाने वाली रुचि थी। जिस समय वह संगीत सुन रहे होते थे, उनका पूरा ध्यान सिर्फ संगीत की ओर ही रहता था। वह उसमें डूबकर उसका आनन्द लेते थे।

जिस समय वह लिख रहे होते थे, उनका रेडियो बन्द रहता था। नियत समय पर काम बन्द करके रेडियो लगाया जाता था, समाचार अथवा संगीत के विशेष कार्यक्रम सुनने के लिए। ये विशेष कार्यक्रम होते थे संगीत सम्बन्धी वार्ताएँ, लोक संगीत के कार्यक्रम, ऐसे कार्यक्रम जिनमें राग विशेष के बारे में बताया जाता था अथवा संगीत का अखिल भारतीय कार्यक्रम।

उन्होंने जब यह निश्चय कर लिया कि वे जीवन में हिन्दी साहित्य की सेवा करेंगे और इसे समृद्ध बनाएँगे तो सबसे पहले उनके मन में विचार आया नाटक लिखने का। उन्होंने कई नाटक लिखे भी; कुछ अन्य के लिखे नाटकों में अभिनय भी किया। दुर्भाग्यवश उनके लिखे नाटकों में से अधिकांश अब उपलब्ध नहीं हैं। नाटककार के लिए संगीत का ज्ञान आवश्यक है, यह सोचकर रामविलास जी ने लखनऊ के संगीत विद्यालय में दाखिला ले लिया। मौखिक गायन के साथ-साथ वायलिन बजाना सीख रहे थे, लेकिन किन्हीं कारणों से वह अपनी संगीत शिक्षा पूरी नहीं कर पाए। संगीत के बारे में सोचना, उस पर प्रयोग करना-जैसे बीमारी में संगीत सुनने से मरीज़ पर क्या असर होता है, उन्होंने अन्त तक नहीं छोड़ा।

अन्य विषयों के साथ-साथ रामविलास जी ने वेदों का गहन अध्ययन किया था। जो लोग वेदों को पूजा-पाठ और मात्र कर्मकाण्ड की पुस्तकें मानते हैं, उन्होंने इसका कुछ और मतलब लगाया। रामविलास जी ऋग्वेद को दार्शनिक काव्य का अनुपम ग्रन्थ मानते थे और उसमें चित्रकारी, नृत्य और संगीत के सूत्रों को रेखांकित करते थे। वे कहते थे कि चित्रकला से प्रभावित होने वाले कवि अनेक देशों में रहे हैं, उन पर काफी लिखा भी गया है, लेकिन स्थापत्य से प्रभावित होने वाले कवि कम रहे हैं और उन पर लिखा भी बहुत कम गया है।

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Paperback

ISBN

Language

Hindi

Pages

Publishing Year

2010

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