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Description
सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है
हिन्दी ग़ज़ल में कहन की, कंटेंट की विविधता की आज़ादी है यद्यपि अब उर्दू शायरी भी सिर्फ़ इश्क़ मोहब्बत नहीं रही। यह बदलाव ही साहित्य को समाज से जोड़ता है। एक अच्छा शेर हमेशा याद रहता है-
शोख इठलाती हुई परियों का है ख़्वाब ग़जल
झील के पानी में उतरे तो है महताब गज़ल
उसकी आँखों का नशा, जुल्फ़ की खुशबू, टीका
रंग और मेंहदी रचे हाथों का आदाब ग़ज़ल
मैंने ग़ज़ल को परिभाषित करने की कोशिश की है। आज ग़ज़ल की लोकप्रियता का ये आलम है कि हिन्दी के साथ अन्य भारतीय भाषाओं यहाँ तक कि बोलियों में भी लिखी और कही जा रही है। मैंने भी विविध विषयों पर ग़ज़ल कही है।
कभी मीराँ, कभी तुलसी, कभी रसखान लिखता हूँ
ग़ज़ल में गीत में पुरखों का हिन्दुस्तान लिखता हूँ
ग़ज़ल ऐसी हो जिसको खेत का मज़दूर भी समझे
दिलों की बात जब हो और भी आसान लिखता हूँ
स्त्री सौन्दर्य का उपमान आज बदल गया है, स्त्री आज जमीन से अन्तरिक्ष तक अपने पराक्रम को दिखा रही है। अब वह घरों के दालान और आँगन की शोभा नहीं है
न चूड़ी है, न बिन्दी है, न काजल, माँग टीका है
ये औरत कामकाजी है ये चेहरा इस सदी का है
आशा है यह संकलन आप सभी को पसन्द आएगा।
जयकृष्ण राय ‘तुषार’
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2025 |
| Pulisher |











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