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Description
मानस के चार घाट
श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः
सादर वन्दन
रेगिस्तान की तपती दुपहरी में मार्ग भटके पथिक को अपने घर पहुँचने पर, प्रतिक्षारत चातक और सीप को स्वाति नक्षत्र की कृपा प्राप्त होने पर, तथा प्यासी प्रकृति के आंगन में ऋतुराज वसन्त के आगमन पर, जितनी आन्तरिक तृप्ति और आनन्द की अनुभूति होती है, उससे किंचित भी कम आनन्द हमें नहीं हुआ, जब प्रातः स्मरणीय परम श्रद्धेय सद्गुरु श्री रामकिंकर जी महाराज का पदार्पण हमारे जीवन में हुआ। हमें सद्गुरु की उतनी ही प्रतीक्षा थी जितनी जितनी की पाषाण बनी अहिल्या को रामचरण धूलि के स्पर्श की थी।
पूज्य महाराज के चरण आशीष के अथाह रत्नाकर में हमारे परिवार ने डुबकी लगाकर अपनी झोली को आन्नद मणि एवं निश्चिंतता के पारस से भरा हुआ पाया।
प्राप्त परिस्थिति में श्री गुरु स्मृति का आलम्बन जीवन में समत्व का निर्माण करता है। हमारे जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी महाराज श्री की स्पष्ट कृपा-वृष्टि हमारे परिवार पर बनी रही। यथा महाराज श्री के असीम कृपापात्र, हमारे आत्मज प्रिय ‘पवनचन्द्र’ के अन्तिम प्रयाण पर श्री गुरु की पुण्य उपस्थिति, परमपद उसका गन्तव्य बन सके, यह अजस्र आशीर्वाद देने, महाराज श्री का इस अवसर पर साक्षात् उपस्थिति होना, इस महान कृपा का सजीव प्रमाण है। हम तो इतना स्वीकाराते हैं कि महाराज श्री की कृपा पाने का संस्कार और सामर्थ्य भी महाराज श्री की कृपा का ही उच्छिष्ट है।
पवन को गमन करते समय महाराज श्री के परम स्नेह, अपनत्व एक आशीष में चन्दन वन का पर्याप्त स्पर्श प्राप्त हुआ। साधारण पवन मलयानिल हो पाया इससे अधिक उसके जीवन की पुण्याई और हमारा सौभाग्य और क्या हो सकता है ? महाराज श्री के ही सान्निध्य में सजे उसके संस्कारों का ही यह फल था कि महाराज श्री की ही स्मृति को पाथेय बनाकर इस लोक से वह महाप्रयाण कर पाया। महाराज श्री ने हमारे पुण्यों की सम्पदा में निश्चित ही श्री वृद्धि की है-
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अन्ता।। (उत्तरकाण्ड 44-3)
हम तो निश्चित ही यह कहेंगे कि महाराज श्री ने ब्रह्माजी की तरह हमारे संस्कारों का सृजन किया, विष्णु जी की तरह उनकी सुरक्षा की तथा शंकर जी की तरह प्रतिकूल संस्कारों का समापन किया। हमारी प्रत्येक श्वास और हृदय का स्पन्दन महाराज श्री के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता रहे यही याचना है।
महाराज श्री ने हमें स्वीकारा यही हम अकिंचन पर महती कृपा का प्रमाण है। हमारे इस अधूरे व्याकरण और जर्जर शब्दों के पास उतना संस्कार ही कहाँ, जो आभार प्रदर्शन की रीति भी निभा पायें !
महाराज श्री कि चरण रज के अभिलाषी
वीना-जगदीश चन्द्रा
।।श्री रामःशरणं मम।।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2023 |
| Pulisher |











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