

Buddiya Ki Teen Raaten

Buddiya Ki Teen Raaten
₹100.00 ₹75.00
₹100.00 ₹75.00
Author: Pardeshiram Verma
Pages: 176
Year: 1994
Binding: Hardbound
ISBN: 9788170553490
Language: Hindi
Publisher: Vani Prakashan
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Description
बुधिया की तीन रातें
‘‘महाराज, महूं नाचहूं’’ कहते हुए नटका साज के भूतपूर्व संचालक भाई चिकरहा उमेंदी ने नाचना शुरू भी कर दिया। जब तक कोई उन्हें सँभालता तब तक वे आलाप ले चुके थे। ‘‘अरे पति करे पत्रनास और नारी करे पति नास जी……और लोकताल पर कूद-कूदकर नचौड़ी पार पर सुर धरते हुए वे ठुमकने लगे।
लोक कला मेला के निर्देशक पंडित जी भी हँसकर रह गये। स्टेज बनाने वाले विख्यात शिल्पकार अपने दल के साथ नीचे उतर आये। ध्वनि और भोजन व्यवस्था से जुड़े लोग भी एकत्र हो गये।
मेला तो शुरू होता पारंपरिक ढंग से रात दस बजे, लेकिन अचानक दिन के तीन बजे पहले ही दिन चिकरहा आ धमके। अभी मंच सज्जा भी पूरी नहीं हुई थी निर्देशक महाराज हड़बड़ाये हुए घूम रहे थे। पहला दिन था। निर्देशक पंडित प्रशन्नदास बार-बार फोन तक जाते और चिंतित होकर लौट आते। वे चाहते थे कि किसी तरह इस वर्ष भी नये मुख्यमंत्री मंच तक आ जाते। इसके लिए उन्होने वर्तमान मुख्यमंत्री गुट के विधायक को महीने भर पहले से कह दिया था। विधायक भी चाहते थे कि किसी बहाने मुख्यमंत्री आकर उनका घटता वजन सुधार जायें और शहर में उनके प्रतिद्वंद्वी के बढ़ रहे वजन को लगे हाथों घटा जायें। पंडित जी इधर इतने बड़े मांगलिक संधान में लगे थे और इधर यह चिकरहा दूसरा आलाप ले रहा था –
‘‘भीख लेके भीख दे।
अऊ तीनों लोक ला जीत ले जी।
पंडित जी को अब चिरकहा की नौटंकी आपत्तिजनक लग रही थी। अभी तो वे बर्दाश्त कर गये मगर इस ‘‘भीख लेके भीख दे तीनों लोक ला जीत ले’’ पंक्ति से लगभग उखड़ गये। उन्हें लगा कि चिकरहा उन्हें ही मानकर यह सब जोड़-घटा रहा है। उन्हें अक्सर यह मानना पड़ता था। मुँह लगे तेली कुर्मी कलाकार समय-कुसमय में आकर एक कंकड़ फेंक ही देते हैं -आप तो महाराज गुरू अब सबके गुरु –
जगत गुरू बाम्हन
अब बाम्हन गुरू गोसाई
यद्यपि पंडित जी केवल प्रसन्नदास ही लिखते हैं मगर उनका पूरा नाम है पंडित प्रसन्नदास वैष्णव अगिनकछार वाले।
कलाकारों के चहेते। खास अपने, उन्हीं तरह गवैया-बजैया-नचैया पंडितजी पिछले बरस सरकार के द्वारा लगाये गये मेले में राऊतों का साज सजाकर राऊत नाचा भी नाच चुके हैं। हैं तो बहुत बडे़ हाकिम मगर वे इसे कभी नहीं भूलते कि बड़ी कुर्सी तक उन्हें मंच ने पहुँचाया है। वर्ना जो शिक्षा-दीक्षा उनकी है उस हिसाब से उन्हें कम-से-कम यह रुतबा तो नहीं ही मिलता।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Hardbound |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 1994 |
| Pulisher |









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