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Description
घर के जोगी
ऐसे अंधेरे में हमें अगर रोशनी दिखती है तो वह अपनी ज़मीन से ही निकलती दिखाई देती है। कविता की ज़मीन हमें अपनी ज़मीन की कविता में ही ढूँढना होगी। कविता का महत्व अपनी ज़मीन ही रेखांकित करेगी। अपने घर के भीतर झांकना और उन मोतियों को ढूँढना जिन्हें विस्मृत किया गया है या जिन्हें रोशनी में नहीं आने दिया गया। ऐसे मोतियों को समाज के सामने लाने से ही ज़मीन की उस कविता को जन-जन तक पहुँचाया जा सकेगा जो आज की ज़रूरत है। यह क़िताब ज़मीन से जुड़े ऐसे ही घर के जोगियों की हैं जिन्हें स्थानीय बोली में तो ‘जोगड़ा’ कहा जाएगा। वो कहावत तो आपने सुनी होगी, घर का जोगी जोगड़ा, आन गांव का सिद्ध’। अपनी ज़मीन की कविता की सुध लेने की कोशिश में अपने ही घर को तलाशा। इस पड़ताल में कविता की समृद्ध परंपरा से परिचित होने का अवसर मिला, जो हमारे लिए धरोहर भी है और प्रेरणा भी। रतलाम शहर जिसने समकालीन कविता के कई हस्ताक्षर को देश से परिचित करवाया। जो पूरे काव्य जगत की पहचान बने।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2024 |
| Pulisher |











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