Hindi Upanyas Aur Yatharthwad

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Hindi Upanyas Aur Yatharthwad

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Author: Dr. Tribhuwan Singh

Availability: 5 in stock

Pages: 940

Year: 2022

Binding: Paperback

ISBN: 9789355181176

Language: Hindi

Publisher: Vani Prakashan

Description

हिन्दी उपन्यास और यथार्थवाद

हिन्दी में उपन्यास बंगला के माध्यम से ही आया, इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता। स्वर्गीय पण्डित माधवप्रसाद मिश्र ने स्पष्ट शब्दों में लिखा था : “जो हो, रिक्तहस्ता हिन्दी ने बँगला के सद्यःपूर्ण भण्डार से केवल ‘उपन्यास’ शब्द ही को ग्रहण नहीं किया वरंच इसका बहुत-सा उपकरण भी इस लघीयसी को उसी महीयसी से मिला है। हिन्दी के प्राणप्रतिष्ठाता स्वयं भारतेन्दु जी ने बंगला के उपन्यासादि के अनुवाद से हिन्दी के भण्डार में वृद्धि की और उनके पीछे स्वर्गीय पण्डित प्रतापनारायण मिश्र जी ने भी इसी मार्ग का अनुसरण किया। इसके साथ ही उक्त महानुभावों ने कृतज्ञतावश यह भी स्वीकार किया है कि जब तक हिन्दी भाषा अपनी इस बड़ी बहन बंगला का सहारा न लेगी, तब तक वह उन्नत न होगी।”

परन्तु हिन्दी उपन्यास मूलतः पश्चिम की देन है जो बंगला से छनकर आया था। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में अंग्रेज़ी शिक्षा के प्रचार और प्रसार से जहाँ पश्चिमी विचारधारा, पश्चिमी रहन-सहन और पश्चिमी वेशभूषा का चलन बढ़ रहा था, वहाँ पश्चिम के नए साहित्य-रूपों का भी हिन्दी में प्रचार होने लगा था और उपन्यास उन नए साहित्य-रूपों में सर्व प्रमुख था।

हिन्दी-उपन्यासों का जहाँ एक ओर बड़ी धूमधाम से स्वागत और प्रचार हो रहा था वहाँ इसके विरोधियों की संख्या भी कम नहीं थी। कुछ लोगों का अनुमान था कि पश्चिमी वेशभूषा के समान यह पश्चिमी साहित्य-रूप भी भारतीय जलवायु के अनुरूप नहीं और इसके प्रकाशन पर रोक लगाये बिना उगती पीढ़ी के चरित्र-भ्रष्ट होने की पूरी आशंका बनी रहेगी। शास्त्रीय और तात्त्विक ग्रन्थों के पढ़ने में परिश्रम अधिक पड़ता है, इसलिए पढ़े-लिखे आलसी उपन्यास की ओर टूट पड़ते हैं जिससे एक ओर तो वे ज्ञान-सम्पादन नहीं कर पाते, दूसरी ओर सस्ते उपन्यासों से उनमें काम-प्रवृत्ति और विकार की वृद्धि होती है।

– पुस्तक की भूमिका से

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Paperback

ISBN

Language

Hindi

Pages

Publishing Year

2022

Pulisher

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