Kathputla

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Kathputla

Kathputla

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Author: Carlo Collody

Availability: Out of stock

Pages: 80

Year: 2018

Binding: Paperback

ISBN: 9788174830555

Language: Hindi

Publisher: Rajpal and Sons

Description

कठपुतला

एक समय की बात है, एक था….

‘‘राजा !’ तुम फौरन कहोगे। लेकिन नहीं बच्चों ! कहानी यों है—एक समय की बात है, एक था लकड़ी का टुकड़ा ! बहुत मामूली-सी लकड़ी का टुकड़ा था वह। जैसे जलाने की लकड़ी समझ लो।

लकड़ी का यह टुकड़ा एक दिन अन्तोनियो नाम के एक बूढ़े बढ़ई की दुकान में पड़ा था। जैसे ही बढ़ई की नज़र इस टुकड़े पर पड़ी, उसका झुर्रियों-भरा चेहरा खुशी से चमक उठा। वह हाथ मलते हुए बोला, ‘‘वाह, मैं बेकार ही परेशान था, इस लकड़ी से उस टेबल की एक टाँग बड़े मजे से बन सकती है।’’

उसने फौरन लकड़ी को छीलने के लिए अपना बसूला निकाला।

जैसे ही वह बसूला चलाने लगा कि उसका हाथ रुक गया। एक पतली-सी आवाज़ में कोई कह रहा था, ‘‘हाय, इतनी ज़ोर से नहीं।’’

बढ़ई ने चौंककर इधर-उधर देखा। कहीं कोई नहीं। दूकान खाली थी। बस, वह था और उसके औज़ार थे, लकड़ी की दो-चार चीज़ें थीं। फिर आवाज़ कहाँ से आई ? हो सकता है, यों ही उसने कुछ सोच लिया हो। उसने लकड़ी छीलने के लिए कसकर बसूला मारा और फिर वहीं आवाज़ रोते हुए स्वर में बोली, ‘‘ओह ! मुझे बहुत चोट लग रही है।’’

इस बार बढ़ई अचम्भे में पड़ गया। आखिर यह कौन है ? किसी बच्चे की आवाज़ मालूम पड़ती है। लेकिन यहाँ आस-पास तो कोई है ही नहीं। वह चिढ़कर जल्दी-जल्दी बसूला चलाता रहा। एक-दो बार फिर आवाज़ आई, लेकिन उसने कोई ध्यान नहीं दिया। लकड़ी का कुछ हिस्सा छीलकर वह उसे चिकना करने के लिए बलुए कागज़ से रगड़ने लगा। इतने में फिर वही आवाज़ कुछ हँसते हुए बोली, ‘‘ही-ही-ही, ज़रा ज़ल्दी करो। मुझे बड़ी गुदगुदी हो रही है।’’

बढ़ई ने लकड़ी का टुकड़ा फौरन दूर फेंक दिया और वह खड़ा हो गया। यह आवाज़ तो शायद उसी लकड़ी के टुकड़े में से आ रही थी। वह पसीने-पसीने हो गया। अब भी उसे ठीक से विश्वास नहीं हो रहा था कि यह आवाज लक़ड़ी के टुकड़े में से आ रही है या कहीं और से ! इतने में बाहर किसी ने दरवाज़ा थपथपाया। बढ़ई ने कहा, ‘‘आ जाओ, कौन है ?’’

तुरन्त एक हँसमुख आदमी उछलकर दुकान पर चढ़ आया। इस आदमी का नाम जेपत्तो था। लेकिन मुहल्ले के लड़के इसे ‘पोलेन्दिना’ कहकर चिढ़ाया करते थे, जिसका मतलब होता है हलुवा। आते ही उसने बढ़ई को सलाम किया और बोला, ‘‘बढ़ई चाचा, आज मुझे एक बात सूझी है।’’

‘‘बोलो, क्या है ?’’

‘‘मैंने सोचा कि मैं लकड़ी का एक खूबसूरत पुतला बनाऊँ।

ऐसा कठपुतला, जो तरह-तरह के खेल दिखाए, नाचे, गाए, धूम मचाए। इस पुतले को लेकर मैं दुनिया भर में घूमूँगा, खेल दिखाऊँगा और रोटी कमाऊँगा। कहो, ठीक है न ?’’

‘‘और क्या, शाबाश, पोलेन्दिना।’’ उस लकड़ी के टुकड़े की तरफ से पतली-सी आवाज़ आई।

जेपेत्तो ने जब यह सुना तो नाराज़ हो गया। उसे सवेरे-ही-सवेरे पोलेन्दिना कहकर चिढ़ाया गया ! वह बढ़ई को डाट कर बोला, ‘‘तुम मुझे चिढ़ा क्यों रहे हो ? तुम मुझे पोलेन्दिना कहते हो !’’

‘‘नहीं, मैंने नहीं कहा।’’ बढ़ई बोला।

‘‘तुमने नहीं कहा, तो क्या मैंने कहा ? तुम्हीं ने मुझे चिढ़ाया !’’

और इस तरह दोनों झगड़ पड़े। काफी देर तक झगड़ने के बाद जब किसी तरह दोनों ठण्डे हुए, तो जेपेत्तो को मनाने के लिए बढ़ई बोला, ‘‘हाँ, तो तुम कठपुतला बनाना चाहते हो ? ठीक है, लेकिन यह तो बताओ कि तुम मेरे पास क्यों आए थे ?’’

‘‘बढ़ई चाचा, बात असल में यह है कि कठपुतला बनाने के लिए मुझे थोड़ी-सी लकड़ी चाहिए। तुम्हारे पास कोई फालतू लकड़ी है ?’’

‘‘हाँ-हाँ, यह लो ! बढ़ई ने खुशी से कहा और लकड़ी का वही टुकड़ा उठा लाया जिसे उसने डरकर दूर फेंक दिया था। लेकिन इतने में एक अजीब बात हो गई। लकड़ी का टुकड़ा उसके हाथ की पकड़ से छूटकर जेपेत्तो की टाँगों से जा टकराया। जेपेत्तो चीखा, ‘‘अरे चाचा, यह क्या करते हो ? मेरा पैर ही तोड़ा होता तुमने !’’

‘‘नहीं तो, मैंने तो कुछ नहीं किया।’’ बढ़ई बोला।

‘‘कहते हो कुछ नहीं किया। तुमने इतने ज़ोर से लकड़ी फेंकी कि मैं तो अभी लंगड़ा ही हो जाता !’’

‘‘नहीं, लकड़ी मैंने फेंकी नहीं, वह तो अपने-आप आ गिरी। इसमें मेरा क्या कुसूर !’’

‘‘तुम झूठ बोलते हो !’’

‘‘तुम हो झूठे, जाओ यहाँ से !’’

और जेपेत्तो बड़बड़ाता हुआ लकड़ी लेकर अपने घर लौट आया।

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Authors

Binding

Paperback

ISBN

Language

Hindi

Pages

Publishing Year

2018

Pulisher

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