Khuda Hafiz Kahne Ka Modh

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Khuda Hafiz Kahne Ka Modh

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295.00 225.00

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Author: Rahi Masoom Raza

Availability: Out of stock

Pages: 156

Year: 2014

Binding: Hardbound

ISBN: 9789350726754

Language: Hindi

Publisher: Vani Prakashan

Description

खुदा हाफिज कहने का मोड़

साहित्य राजनीतिक नहीं होता। साहित्यकार किसी विचारधारा का ढिंढोरची भी नहीं होता। परन्तु हर साहित्य का एक सामाजिक आधार होता है। यदि साहित्य का राजनीतिक और सामाजिक आधार न हो, तो वह साहित्य नहीं रह जाता। यह बात मैं चौंकाने के लिए नहीं कह रहा हूँ। बल्कि इसलिए कह रहा हूँ कि राजनीति वस्त्र नहीं है कि मैला हो जाय तो बदल लिया जाय या फट जाय तो नया बना लिया जाय। वस्तुतः राजनीति भी समाज का अंग है। वह समाज से नहीं है। वह समाज में है। और चूँकि साहित्यकार समाज से बाहर नहीं जा सकता, इसलिए किसी राजनीतिक विचारधारा को न मानते हुए भी वह राजनीति से कतरा कर नहीं गुजर सकता। इसलिए साहित्य के ताने-बाने में भी राजनीति को डोर खपी हुई है। इसलिए वह साहित्य हो ही नहीं सकता, जिसका राजनीतिक आधार न हो।

साहित्य चूँकि शब्दों को प्रतीक बनाकर उनका प्रयोग करता है, इसलिए मैं वहीं से बात शुरू करना चाहता हूँ। मैं यह कहने की अनुमति चाहता हूँ कि साहित्य की भाषा तो एक तरफ़ रही, हमारी बोलचाल की भाषा पर भी वातावरण और समाज की गहरी छाप होती है। यदि हम अपने मुहावरों पर से बोलचाल की धूल झाड़ कर देखें तो हम उन पर समाज की उँगलियों के निशान देख सकते हैं। परन्तु हम लोग इस प्रकार के काम करते ही नहीं। शायद हमें अपने समाज, उसकी बनावट और उसकी कहानी में कोई दिलचस्पी ही नहीं है। हमने समाज से शब्द माँगना छोड़ दिया है। हम यह समझने लगे हैं कि शब्दकोश काफ़ी है। और चूँकि शब्दकोश नागरिक है और ग्रामवासी नहीं है इसीलिए अपने समाज की पूरी हक़ीक़त हमारे हाथ नहीं आती और हम अधूरी हक़ीक़तों को इलियट के हवालों से पूरा करने की कोशिश करते रहते हैं।

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Authors

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Hardbound

ISBN

Language

Hindi

Pages

Publishing Year

2014

Pulisher

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