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Sahitya Ka Samajshastra
₹350.00 ₹263.00



₹350.00 ₹263.00
₹350.00 ₹263.00
Author: Bachchan Singh
Pages: 100
Year: 2025
Binding: Hardbound
ISBN: 9788180312656
Language: Hindi
Publisher: Lokbharti Prakashan
साहित्य का समाजशास्त्र
राजनीतिक जगत की तरह आलोचना भी दो शिविरों में बँट गई है—समाजशास्त्र का शिविर और भाषाशास्त्र का शिविर। दोनों शिविर समय-समय पर एक दूसरे पर हमला करते हैं। आलोचना का संकट यह है कि क्या उसे हर हालत में शिविरबद्ध होकर ही रहना पड़ेगा ? सही बात तो यह है कि हम न जीवन में विज्ञान और टेक्नोलॉजी से मुक्त हो सकते हैं और न साहित्य से। यदि साहित्य को अपनी रक्षा करनी है तो उसे विज्ञान और टेक्नोलॉजी से सहायता लेनी पड़ेगी। अत: साहित्य के रूपवादी दृष्टिकोण की एकतरफ़ा भर्त्सना नहीं की जा सकती। उसमें ऐसे तत्त्व मौजूद हैं जिनसे समाजशास्रीय आलोचना सम्पुष्ट और मुकम्मल होगी।
| Authors | |
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| Binding | Hardbound |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2025 |
| Pulisher |
बच्चन सिंह
‘हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास’ के रूप में हिन्दी को एक अनूठा आलोचना-ग्रन्थ देनेवाले बच्चन सिंह का जन्म ज़िला—जौनपुर के मदवार गाँव में हुआ था।
शिक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला में हुई।
आपकी प्रमुख कृतियाँ हैं : ‘क्रान्तिकारी कवि निराला’, ‘नया साहित्य’, ‘आलोचना की चुनौती’, ‘हिन्दी नाटक’, ‘रीतिकालीन कवियों की प्रेम-व्यंजना’, ‘बिहारी का नया मूल्यांकन’, ‘आलोचक और आलोचना’, ‘आधुनिक हिन्दी आलोचना के बीज शब्द’, ‘साहित्य का समाजशास्त्र और रूपवाद’, ‘आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास’, ‘भारतीय और पाश्चात्य काव्यशास्त्र का तुलनात्मक अध्ययन’ तथा ‘हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास’

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