Angad Charitra

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Author: Sriramkinkar Ji Maharaj

Availability: 8 in stock

Pages: 264

Year: 2014

Binding: Paperback

ISBN: 0

Language: Hindi

Publisher: Ramayanam Trust

Description

अंगद चरित्र

प्रथम

‘मानस’ में कुछ चरित्र ऐसे हैं, जो साधना की दृष्टि से बड़े उपयोगी हैं और उनमें से एक है अंगद का चरित्र। अंगद के चरित्र में कुछ उत्कृष्ट गुण हैं, तो उनके साथ कुछ कमियाँ भी हैं। परन्तु उनके चरित्र की यह विशेषता है कि उसमें निरन्तर विकास होता हुआ दिखाई देता है और वे क्रमशः अपनी कमियों से ऊपर उठते हुए भक्ति की चरम स्थिति तक पहुँचने में समर्थ होते हैं।

दूसरी ओर ‘मानस’ में कुछ चरित्रों में उत्कृष्ट-से-उत्कृष्ट गुण विद्यमान हैं। वे सिद्धावस्था तथा परिपूर्णता के चरित्र होते हुए भी हमारे लिए वन्दनीय तथा आदर्श तो हैं, परन्तु साधना में उन्नति के लिए जिस क्रम की आवश्यकता है, उन चरित्रों में उसका दर्शन नहीं होता है। पर कुछ ऐसे पात्र भी हैं, जिनके चरित्र में गुण तथा दोष दोनों ही पक्ष विद्यमान हैं। काकभुशुण्डिजी का चरित्र भी उनमें से एक है, जिसमें साधना की दृष्टि से क्रमिक विकास दीख पड़ता है।

अंगद के प्रारम्भिक चरित्र में कुछ कमियाँ हैं और वे उन कमियों को दूर करते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं। काकभुशुण्डि के चरित्र में भी यही विशेषता है कि वे एक ऐसी स्थिति से साधना आरम्भ करते हैं, जब उनमें अनेकों दोष विद्यमान थे, पर इसके पश्चात् वे ऐसी स्थिति तक पहुँच जाते हैं कि कल्पान्त में भी उनके गुणों का विनाश नहीं होता। उनकी गणना राम भक्ति के महान आचार्यों में की गई है उनके चरित्र से हम लोगों को आशा बँधती है। ऊँचे-चरित्रों को पढ़कर या सुनकर प्रसन्नता और आनन्द की अनुभूति तो होती है, परन्तु उसमें एक यह भय लगा रहता है कि इतनी ऊँचाई तो हमारे जीवन में नहीं है। इतने उत्कृष्ट विचार, इतनी उत्कृष्ट भावना तो हमारे जीवन में नहीं है। साधक के जीवन में इससे एक प्रकार की निराशा सी आ सकती है कि वह इन विशेषताओं को अपने जीवन में ला पाने में समर्थ नहीं है। लेकिन जब हम ऐसे पात्रों के विषय में पढ़ते या सुनते हैं, जिनके चरित्र में हमारे ही समान अनेक त्रुटियाँ और कमियाँ विद्यमान हैं, परन्तु वे धीरे-धीरे इन कमियों से मुक्त होते हैं, तब इसके द्वारा हम लोगों को भी यह आश्वासन मिलता है कि निराश होने की कोई बात नहीं है; जिस स्थिति को इन भक्तों या पात्रों ने अपने जीवन में पाया है, उसी मार्ग पर चलकर हम भी उसे पा सकते हैं। अंगद का चरित्र ठीक इसी प्रकार का चरित्र है।

इसीलिए गोस्वामीजी इन चरित्रों पर बड़ा बल देते हैं। ‘विनय-पत्रिका’ में आप देखेंगे कि भगवान की कृपा का वर्णन करते समय वे उसके साथ बड़े-बड़े ऐतिहासिक पात्रों का नाम लेते हैं और अन्त में वे अपना नाम भी जोड़ देते हैं। भगवान की उदारता का वर्णन करते हुए वे कहते हैं –

ऐसी कौन प्रभु की रीति ?

बिरद हेतु पुनीत परिहरि पाँवरनि पर प्रीति।।

गई मारन पूतना कुच कालकूट लगाइ।

मातु की गति दई ताहि कृपालु जादवराइ।।

काममोहित गोपिकनिपर कृपा अतुलित कीन्ह।

जगत-पिता बिरंचि जिन्हके चरनकी रज लीन्ह।।

नेमतें सिसुपाल दिन प्रति देत गनि गनि गारि।

कियो लीन सु आपमें हरि राज-सभा मँझारि।।

ब्याध चित दै चरन मार्यो मूढ़मति मृग जानि।

सो सदेह स्वलोक पठयो प्रगट करि निज बानि।।

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Authors

Binding

Paperback

ISBN

Language

Hindi

Pages

Publishing Year

2014

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