

Bhikshuni

Bhikshuni
₹199.00 ₹147.00
₹199.00 ₹147.00
Author: Shivani
Pages: 120
Year: 2026
Binding: Paperback
ISBN: 9788183611145
Language: Hindi
Publisher: Radhakrishna Prakashan
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Description
भिक्षुणी
महिला कथाकारों में जितनी ख्याति और लोकप्रियता शिवानी ने प्राप्त की है, वह एक उदाहरण है श्रेष्ठ लेखन के लोकप्रिय होने का। शिवानी लोकप्रियता के शिखर को छू लेनेवाली ऐसी हस्ती हैं, जिनकी लेखनी से उपजी कहानियाँ कलात्मक और मर्मस्पर्शी होती हैं।
अन्तर्मन की गहरी पर्तें उघाड़नेवाली ये मार्मिक कहानियाँ शिवानी की अपनी मौलिक पहचान हैं जिसके कारण उनका अपना एक व्यापक पाठक वर्ग तैयार हुआ।
इनकी कहानियाँ न केवल श्रेष्ठ साहित्यिक उपलब्धियाँ हैं, बल्कि रोचक भी इतनी अधिक हैं कि आप एक बार शुरू करके पूरी पढ़े बिना छोड़ ही न सकेंगे।
प्रस्तुत संग्रह में ‘तोमार जे दोक्खिन मुख’, ‘ज्यूडिश से जयन्ती’, ‘भिक्षुणी’, ‘मामाजी’, ‘अनाथ’, ‘भूल’, ‘सती’, ‘मौसी’, ‘प्रतीक्षा’ एवं ‘लाटी’ कहानियाँ संकलित हैं। हर कथा अपनी मोहक शैली में अभिभूत कर देने की अपार क्षमता रखती है।
कलात्मक कौशल के साथ रची गईं ये कहानियाँ हमारी धरोहर हैं जिन्हें आज की नई पीढ़ी अवश्य पढ़ना चाहेगी।
अनुक्रम
- तोमार जे दोक्खिन मुख
- ज्यूडिथ से जयन्ती
- भिक्षुणी
- मामाजी
- अनाथ
- भूल
- सती
- मौसी
- प्रतीक्षा
- लाटी
तोमार जे दोक्खिन मुख
गम्भीर रात की गहन शून्यता में तमिलनाडु एक्सप्रेस तेजी से वन-अरण्यों को चीरती जा रही थी। उस सुदीर्घ यात्रा में अपने डिब्बे का एकान्त सहसा मुझे भयावह लगने लगा। एक बार कंडक्टर आकर, बड़ी नम्रता से पूछ कर चला गया था, ‘‘मैडम, यदि आपको अकेले सफर करने में आपत्ति हो तो बगल के डिब्बे में ऊपर एक बर्थ खाली है…’’
‘‘नहीं, मैं यहीं ठीक हूँ।’’ कह, मैंने उसका विनम्र प्रस्ताव फेर दिया था। अटपटे अनचीन्हें यात्रियों के सहचर्य से मुझे एकान्त ही अच्छा लगता है। किन्तु अँधेरा होते ही वह एकान्त मुझे सहमा गया। बत्ती जलाकर मैंने एक बार पढ़ी पत्रिकाओं को फिर उलटा-पलटा। चिटखनी ठीक से लगी है या नहीं, यह देखा। सिरहाने की खिड़की के दोनों शटर चढ़ा लिये। फिर भी न जाने कैसा भय लग रहा था। इससे पूर्व भी कई बार अकेले कूपे में यात्रा कर चुकी थी। किन्तु अस्तिबोध ने कभी नहीं सहमाया। मन ही मन मनाती जा रही थी कि किसी सदगृहस्थ का परिवार यात्री बन जाए, क्योंकि कंडक्टर कह गया था, नागपुर से प्रायः ही भीड़ बढ़ती है। नागपुर में कोई परिवार तो नहीं आया, किन्तु एक के बाद एक दो सहयात्रियों ने मेरे सशंकित चित्त को शांत कर दिया। एक महाराष्ट्रीय महिला केवल एक टोकरी और एक बटुआ लेकर ठीक सामने की बर्थ पर आकर बैठ गई तो मेराचित्त विषण्ण हो गया। मैं समझ गयी थी कि उसकी यात्रा निश्चय ही ह्रस्व होगी। शायद तीन-चार स्टेशन बाद ही उतर जाएगी क्योंकि संसार की कोई भी नारी दीर्घ यात्रा बिना सामान के सम्पन्न नहीं कर सकती। मेरा अनुमान ठीक ही था।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2026 |
| Pulisher |









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